भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1312, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1312

१२९६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६

होतारः सोमं राजानं जुह्वति ।<br><br>योऽसौ द्युलोकाग्नौ श्रद्धायां हुतायामभिनिर्वृत्तः सोमः स द्वितीये पर्जन्याग्नौ हूयते; तस्याश्च सोमाहुतेर्वृष्टिः संभवति ॥ १० ॥ही होतृगण सोम राजाको होमते हैं। जो यह द्युलोकाग्निमें श्रद्धाका हवन करनेपर निष्पन्न हुआ सोम था, उसीको इस द्वितीय पर्जन्य (मेघ) रूप अग्निमें होमा जाता है। उस सोमकी आहुतिसे वृष्टि होती है ॥ १० ॥

३-इहलोकाग्नि

अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्य पृथिव्येव समिदग्निर्धूमो रात्रिरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नँ संभवति ॥ ११ ॥

हे गौतम ! यह लोक ही अग्नि है। इसकी पृथिवी ही समिध् है, अग्नि धूम है, रात्रि ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवता वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न होता है ॥ ११ ॥

अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम;<br>अयं लोक इति प्राणिजन्मोपभोगाश्रयः क्रियाकारकफलविशिष्टः स तृतीयोऽग्निः;<br>तस्याग्नेः पृथिव्येव समित्; पृथिव्या ह्ययं लोकोऽनेकप्राण्युपभोगसंपन्नया समिध्यते ।हे गौतम ! यह लोक ही अग्नि है। यह लोक अर्थात् प्राणियोंके जन्म और उपभोगका आश्रयभूत तथा क्रिया, कारक और फलसे युक्त ऐसा जो यह लोक है, वही तृतीय अग्नि है। उस अग्निका पृथिवी ही समिध् है। प्राणियोंके अनेकों उपभोगोंसे सम्पन्न इस पृथिवीसे ही यह लोक दीप्त होता है।
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