बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1311, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२९५
स्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमँ राजानं जुह्वति तस्या आहुत्यै वृष्टिः संभवति ॥ १० ॥
हे गौतम ! मेघ ही अग्नि है। संवत्सर ही उसका समिध् है, अभ्र धूम हैं, विद्युत् ज्वाला है, अशनि (इन्द्रका वज्र) अङ्गार है, मेघगर्जन विस्फुलिङ्ग है। उस इस अग्निमें देवगण सोम राजाको हवन करते हैं। उस आहुतिसे वृष्टि होती है ॥ १० ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम द्वितीय आहुत्याधार आहुत्योरावृत्तिक्रमेण। पर्जन्यो नाम वृष्ट्युपकरणाभिमानी देवतात्मा, तस्य संवत्सर एव समित्—संवत्सरेण हि शरदादिभिर्ग्रीष्मान्तैः स्वावयवैर्विपरिवर्तमानेन पर्जन्योऽग्निर्दीप्यते। | हे गौतम ! मेघ ही अग्नि है अर्थात् आहुतियोंकी आवृत्तिके क्रमसे द्वितीय आहुतिका आधार है। वृष्टिकी सामग्रीके अभिमानी देवताको पर्जन्य (मेघ) कहा गया है। उसका संवत्सर समिध् है। शरदसे लेकर ग्रीष्मपर्यन्त अपने अंशोंद्वारा विभिन्नरूपसे परिवर्तित होते हुए संवत्सरके द्वारा ही मेघरूप अग्नि दीप्त होता है। |
| अभ्राणि धूमः, धूमप्रभवत्वादू धूमवदुपलक्ष्यत्वाद्वा। विद्युदर्चिः, प्रकाशसामान्यात्। अशनिरङ्गाराः, उपशान्तत्वकाठिन्यसामान्याभ्याम्। ह्लादुनयो ह्लादुनयः स्तनयित्नुशब्दा विस्फुलिङ्गाः, विक्षेपानेकत्वसामान्यात्। | अभ्र (बादल) धूम हैं; क्योंकि वे धूमसे उत्पन्न होते हैं अथवा धूमके समान दिखायी देते हैं। विद्युत् ज्वाला है; क्योंकि प्रकाशमें उनकी समानता है। उपशान्तत्व और कठिनतामें समानता होनेके कारण अशनि अङ्गारे हैं। 'ह्लादुनयः' अर्थात् मेघकी गर्जनाएँ विक्षेप और अनेकत्वमें समानता होनेके कारण विस्फुलिङ्ग हैं। |
| तस्मिन्नेतस्मिन्नित्याहुत्यधिकरणनिर्देशः। देवा इति त एव | 'उस इस (अग्नि) में' ऐसा कहकर आहुतिके अधिकरणका निर्देश किया गया है—देवगण अर्थात् वे |