बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1310, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| वायिन्यः कर्तुः शरीरारम्भकाः श्रद्धाशब्दवाच्या इति निश्चीयते। भूयस्त्वादापः पुरुषवाच इति व्यपदेशो न त्वितराणि भूतानि न सन्तीति। | निश्चय होता है कि कर्ताके शरीरका आरम्भ करनेवाला कर्मसम्बन्धी आप श्रद्धाशब्दवाच्य है। अन्य भूतोंकी अपेक्षा जलकी अधिकता होनेके कारण 'आपः पुरुषवाचः' ऐसा व्यपदेश किया जाता है, ऐसी बात नहीं है कि अन्य भूत हैं ही नहीं। | | कर्मप्रयुक्तश्च शरीरारम्भः, कर्म चाप्समवायि। ततश्चापां प्राधान्यं शरीरकर्तृत्वे। तेन चापः पुरुषवाच इति व्यपदेशः कर्मकृतो हि जन्मारम्भः सर्वत्र। तत्र यद्यप्यग्निहोत्राहुतिस्तुतिद्वारेणोत्क्रान्त्यादयः प्रस्तुताः षट्पदार्था अग्निहोत्रे तथापि वैदिकानि सर्वाण्येव कर्माण्यग्निहोत्रप्रभृतीनि लक्ष्यन्ते। दाराग्निसम्बद्धं हि पाङ्क्तं कर्म प्रस्तुत्योक्तम्—"कर्मणा पितृलोकः" (१। ५। १६) इति। वक्ष्यति च—"अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति (६। २। १६) इति॥ ९॥ | शरीरका आरम्भ कर्मप्रयुक्त ही है और कर्म आपसे सम्बन्ध रखता है। अतः शरीररचनामें 'आप' की प्रधानता है। इससे भी 'आपः पुरुषवाचः' ऐसा उल्लेख किया गया है। सभी जगह जन्मका आरम्भ कर्मके कारण ही है। वहाँ अग्निहोत्रके प्रकरणमें यद्यपि अग्निहोत्रकी आहुतियोंकी स्तुतिके द्वारा उत्क्रान्ति आदि छः पदार्थ प्रस्तुत किये गये हैं, तो भी उससे अग्निहोत्रादि सारे ही वैदिक कर्म लक्षित होते हैं। स्त्री और अग्निसे सम्बन्ध रखनेवाले पाङ्क्तकर्मका आरम्भ करके "कर्मसे पितृलोक प्राप्त होता है" ऐसा कहा गया है तथा आगे भी "जो यज्ञ, दान और तपसे लोकोंको जय करते हैं" ऐसा श्रुति कहेगी॥ ९॥ |
२—पर्जन्याग्नि
पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम तस्य संवत्सर एव समिदभ्राणि धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विस्फुलिङ्गास्त-