भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1314, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1314

१२९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६


संभवति; वृष्टिप्रभवत्वस्य प्रसिद्धत्वाद् व्रीहियवादेरन्नस्य ॥ ११ ॥क्योंकि व्रीहि-यवादि अन्नका वृष्टिसे उत्पन्न होना प्रसिद्ध ही है ॥ ११ ॥

४-पुरुषाग्नि

पुरुषो वा अग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित् प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः संभवति ॥ १२ ॥

हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसका खुला हुआ मुख ही समिध् है, प्राण धूम है, वाक् ज्वाला है, नेत्र अङ्गार हैं, श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवगण अन्नको होमते हैं । उस आहुतिसे वीर्य होता है ॥ १२ ॥

पुरुषो वा अग्निर्गौतम प्रसिद्धः शिरःपाण्यादिमान् पुरुषश्चतुर्थोऽग्निस्तस्य यद्व्यात्तं विवृतं मुखं समित्; विवृतेन हि मुखेन दीप्यते पुरुषो वचनस्वाध्यायादौ; यथा समिधाग्निः। प्राणो धूमस्तदुत्थानसामान्यात्; मुखाद्धि प्राण उत्तिष्ठति ।<br><br>वाक्—शब्दोऽर्चिर्व्यञ्जकत्वसामान्यात्; अर्चिश्च व्यञ्जकम्, तथा वाक्शब्दोऽभिधेयव्यञ्जकः।हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। हाथ-पाँव आदि अवयवोंवाला प्रसिद्ध पुरुष ही चतुर्थ अग्नि है। उसका व्यात्त—खुला हुआ मुख ही समिध् है; क्योंकि खुले हुए मुखसे ही बोलने और स्वाध्यायादिमें पुरुष दीप्त होता (शोभा पाता) है, जिस प्रकार कि समिध्से अग्नि। ईंधनसे उठनेमें समानता होनेके कारण प्राण धूम है, क्योंकि मुखसे ही प्राण उठता है।<br><br>व्यञ्जकत्वमें समानता होनेके कारण वाक् यानी शब्द ज्वाला है। ज्वाला वस्तुको प्रकाशित करनेवाली होती है, इसी प्रकार वाक् अर्थात् शब्द भी वाच्यको अभिव्यक्त करनेवाला होता है।
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