बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१२९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
१२९८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| संभवति; वृष्टिप्रभवत्वस्य प्रसिद्धत्वाद् व्रीहियवादेरन्नस्य ॥ ११ ॥ | क्योंकि व्रीहि-यवादि अन्नका वृष्टिसे उत्पन्न होना प्रसिद्ध ही है ॥ ११ ॥ |
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४-पुरुषाग्नि
पुरुषो वा अग्निर्गौतम तस्य व्यात्तमेव समित् प्राणो धूमो वागर्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुत्यै रेतः संभवति ॥ १२ ॥
हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसका खुला हुआ मुख ही समिध् है, प्राण धूम है, वाक् ज्वाला है, नेत्र अङ्गार हैं, श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवगण अन्नको होमते हैं । उस आहुतिसे वीर्य होता है ॥ १२ ॥
| पुरुषो वा अग्निर्गौतम प्रसिद्धः शिरःपाण्यादिमान् पुरुषश्चतुर्थोऽग्निस्तस्य यद्व्यात्तं विवृतं मुखं समित्; विवृतेन हि मुखेन दीप्यते पुरुषो वचनस्वाध्यायादौ; यथा समिधाग्निः। प्राणो धूमस्तदुत्थानसामान्यात्; मुखाद्धि प्राण उत्तिष्ठति ।<br><br>वाक्—शब्दोऽर्चिर्व्यञ्जकत्वसामान्यात्; अर्चिश्च व्यञ्जकम्, तथा वाक्शब्दोऽभिधेयव्यञ्जकः। | हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। हाथ-पाँव आदि अवयवोंवाला प्रसिद्ध पुरुष ही चतुर्थ अग्नि है। उसका व्यात्त—खुला हुआ मुख ही समिध् है; क्योंकि खुले हुए मुखसे ही बोलने और स्वाध्यायादिमें पुरुष दीप्त होता (शोभा पाता) है, जिस प्रकार कि समिध्से अग्नि। ईंधनसे उठनेमें समानता होनेके कारण प्राण धूम है, क्योंकि मुखसे ही प्राण उठता है।<br><br>व्यञ्जकत्वमें समानता होनेके कारण वाक् यानी शब्द ज्वाला है। ज्वाला वस्तुको प्रकाशित करनेवाली होती है, इसी प्रकार वाक् अर्थात् शब्द भी वाच्यको अभिव्यक्त करनेवाला होता है। |
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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १२९९
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १२९९
| चक्षुरङ्गाराः, उपशमसामान्यात् प्रकाशाश्रयत्वाद् वा । श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः, विक्षेपसामान्यात् ।<br><br>तस्मिन्नन्नं जुह्वति ।<br><br> ननु नैव देवा अन्नमिह जुह्वतो दृश्यन्ते ?<br><br> नैष दोषः, प्राणानां देवत्वोपपत्तेः। अधिदैवमिन्द्रादयो देवास्त एवाध्यात्मं प्राणास्ते चान्नस्य पुरुषे प्रक्षेप्सारः ।<br><br> तस्या आहुते रेतः संभवति; अन्नपरिणामो हि रेतः ॥१२॥ | उपशममें समानता होनेके कारण अथवा प्रकाशके आश्रय होनेके कारण नेत्र अङ्गार हैं। विक्षेपमें समानता होनेके कारण श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं। इस पुरुषरूप अग्निमें अन्न होम करते हैं।<br><br> **शङ्का—**किंतु देवगण इसमें अन्न होम करते देखे तो नहीं जाते ?<br><br> **समाधान—**यह दोष नहीं है; क्योंकि प्राणोंको देव माना जा सकता है। जो अधिदैव इन्द्रादि देव हैं, वे ही अध्यात्म प्राण हैं, वे ही पुरुषमें अन्न डालनेवाले हैं।<br><br> उस आहुतिसे वीर्य होता है; क्योंकि वीर्य अन्नका ही परिणाम है ॥ १२ ॥ |
५–योषाग्नि
योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समि- ल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः संभवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १३ ॥
हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उपस्थ ही उसकी समिध् है, लोम धूम है, योनि ज्वाला है, जो भीतरको [ मैथुनव्यापार ] करता है, वह अङ्गार है, आनन्दलेश विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवगण वीर्य
१३०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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होमते हैं, उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है। वह जीवित रहता है। जबतक कर्म शेष रहते हैं, वह जीवित रहता है और जब मरता है ॥१३॥
| योषा वा अग्निर्गौतम। योषेति स्त्री पञ्चमो होमाधिकरणोऽग्निस्तस्या उपस्थ एव समित्; तेन हि सा समिध्यते लोमानि धूमस्तदुत्थानसामान्यात्। योनिरर्चिर्वर्णसामान्यात्। यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अन्तःकरणं मैथुनव्यापारः तेऽङ्गारा वीर्योपशमहेतुत्वसामान्यात्-वीर्याद्युपशमकारणं मैथुनम्, तथाङ्गारभावोऽग्नेरुपशमकारणम्। अभिनन्दाः सुखलवाः, क्षुद्रत्वसामान्याद् विस्फुलिङ्गाः। तस्मिन् रेतो जुह्वति, तस्या आहुतेः पुरुषः संभवति। <br><br> एवं द्युपर्जन्यायंलोकपुरुषयोषाग्निषु क्रमेण हूयमानाः श्रद्धासोमवृष्ट्यन्नरेतोभावेन स्थूलतारतम्यक्रममापद्यमानाः श्रद्धाशब्दवाच्या आपः पुरुषशरीरमार- | हे गौतम! योषा ही अग्नि है। योषा अर्थात् स्त्री यह पांचवाँ होमाधिकरणरूप अग्नि है। उपस्थ ही उसका समिध् है। उसीसे वह दीप्त होती है। समिध् से उठनेमें समानता होनेके कारण लोम ही धूम हैं। वर्णमें समानता होनेके कारण योनि ज्वाला है। जो अन्तः (भीतर) करता है, वह अङ्गार है। भीतर करना मैथुनव्यापार अङ्गार है; क्योंकि वीर्यके उपशमके हेतु होनेमें उनकी समानता है। मैथुन वीर्यादिके उपशमका कारण है, इसी प्रकार अङ्गारभाव अग्निके उपशमका कारण है। क्षुद्रत्वमें समानता होनेके कारण अभिनन्द- लेशमात्र सुख विस्फुलिङ्ग हैं। उस (योषाग्नि) में देवगण वीर्य होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है। <br><br> इस प्रकार द्युलोक, मेघ, इहलोक, पुरुष और स्त्रीरूप अग्नियोंमें क्रमसे हवन किये गये श्रद्धा, सोम, वृष्टि, अन्न और वीर्यरूपसे स्थूल तारतम्य क्रमको प्राप्त हुआ श्रद्धाशब्दवाच्य आप् पुरुषशरीरको आरम्भ |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३०१
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३०१
| भन्ते । यः प्रश्नश्चतुर्थो वेत्थ यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती ३ इति स एष निर्णीतः; पञ्चम्यामाहुतौ योषाग्नौ हुतायां रेतोभूता आपः पुरुषवाचो भवन्तीति ।<br><br>स पुरुष एवं क्रमेण जातो जीवति । कियन्तं कालम् इत्युच्यते—यावज्जीवति यावदस्मिञ्छरीरे स्थितिनिमित्तं कर्म विद्यते तावदित्यर्थः, अथ तत्क्षये यदा यस्मिन् काले म्रियते ॥ १३॥ | करता है । 'क्या तू जानता है कि कितनी संख्यावाली आहुतिके हवन किये जानेपर आप पुरुषशब्दवाच्य होकर उठकर बोलने लगता है ?' ऐसा जो चतुर्थ प्रश्न था, उसका यह निर्णय हो गया कि योषाग्निमें पांचवीं आहुतिके हवन किये जानेपर वीर्यभूत आप पुरुषशब्दवाच्य होता है।<br><br>इस क्रमसे उत्पन्न हुआ वह पुरुष जीवित रहता है। कितने काल जीवित रहता है ? सो बतलाया जाता है—'यावज्जीवति'—जबतक इस शरीरमें इसकी स्थितिके निमित्तभूत कर्म रहते हैं, तबतक जीवित रहता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। फिर उनका क्षय होनेपर जब वह मरता है ॥ १३ ॥ |
प्रथम प्रश्नका उत्तर—अन्त्येष्टि संस्काररूप अन्तिम आहुति
अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समिद् धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरङ्गारा अङ्गारा विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णः संभवति ॥ १४॥
तब इसे अग्निके पास ले जाते हैं। उस (आहुतिभूत पुरुष) का अग्नि ही अग्नि होता है, समिध् समिध् होती है, धूम धूम होता है, ज्वाला ज्वाला होती है, अङ्गारे अङ्गारे होते हैं और विस्फुलिङ्ग विस्फुलिङ्ग होते हैं।
१३०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६
१३०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६
उस इस अग्निमें देवगण पुरुषको होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष अत्यन्त दीप्तिमान् हो जाता है ॥ १४ ॥
| अथ तदैनं मृतमग्नयेऽन्त्यर्थमेवा- <br>न्त्याहुत्यै हरन्ति ऋत्विजस्तस्याहु- <br>तिभूतस्य प्रसिद्धोऽग्निरेव होमाधि- <br>करणं न परिकल्प्योऽग्निः। प्रसिद्धैव <br>समित् समिद् धूमो धूमोऽर्चिरर्चि- <br>रङ्गारा अङ्गारा विस्फुलिङ्गा विस्फु- <br>लिङ्गाः—यथाप्रसिद्धमेव सर्व- <br>मित्यर्थः । <br>तस्मिन् पुरुषमन्त्याहुतिं <br>जुह्वति। तस्या आहुत्या आहुतेः <br>पुरुषो भास्वरवर्णोऽतिशयदीप्ति- <br>मान्; निषेकादिभिरन्त्याहुत्यन्तैः <br>कर्मभिः संस्कृतत्वात् संभवति <br>निष्पद्यते ॥ १४ ॥ | तब इस मृत पुरुषको 'अग्नये'— <br>अग्नि के ही लिये अन्तिम आहुतिके <br>प्रयोजनसे ऋत्विगगण ले जाते हैं। <br>उस आहुतिभूत पुरुषका प्रसिद्ध <br>अग्नि ही होमाधिकरण होता है, <br>कोई कल्पित अग्नि नहीं। प्रसिद्ध <br>समिध् ही समिध् होती है, धूम धूम <br>होता है, ज्वाला ज्वाला होती है, <br>अङ्गारे अङ्गारे होते हैं और विस्फु- <br>लिङ्ग विस्फुलिङ्ग होते हैं। तात्पर्य <br>यह है कि ये सब जैसे प्रसिद्ध हैं वे <br>ही होते हैं। <br>उसमें पुरुषरूप अन्तिम आहु- <br>तिको होम करते हैं। उस आहुति- <br>से पुरुष भास्वरवर्ण—अत्यन्त <br>दीप्तिमान् हो जाता है; गर्भाधानसे <br>लेकर अन्त्येष्टितकके सम्पूर्ण कर्मों- <br>से संस्कारयुक्त होनेके कारण <br>वह अतिशय दीप्तिमान् हो जाता <br>है ॥ १४ ॥ |
पञ्चम प्रश्नका उत्तर—देवयानमार्गका वर्णन
| इदानीं प्रथमप्रश्ननिराकरणार्थ- <br>माह— | अब प्रथम प्रश्नका निराकरण <br>करनेके लिये राजा कहता है— |
ते य एवमेतद् विदुर्य्ये चामी अरण्ये श्रद्धाँसत्यमु- पासते तेऽर्चिरभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह आपूर्य्यमाणपक्ष-
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३०३
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३०३
मापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ्ङादित्य एति मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्याद् वैद्युतं तान् वैद्युतान् पुरुषो मानस एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १५ ॥
वे जो [ गृहस्थ ] इस प्रकार इस [ पञ्चाग्निविद्या ] को जानते हैं तथा जो [ संन्यासी या वानप्रस्थ ] वनमें श्रद्धायुक्त होकर सत्य ( ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भ ) की उपासना करते हैं, वे ज्योतिके अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं, ज्योतिके अभिमानी देवताओंसे दिनके अभिमानी देवताको, दिनके अभिमानी देवतासे शुक्लपक्षाभिमानी देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तरकी ओर रहकर चलता है उन उत्तरायणके छः महीनोंके अभिमानी देवताओंको [ प्राप्त होते हैं, ] षण्मासाभिमानी देवताओंसे देवलोकको, देवलोकसे आदित्यको और आदित्यसे विद्युत्सम्बन्धी देवताओंको प्राप्त होते हैं। उन वैद्युत देवोंके पास एक मानस पुरुष आकर इन्हें ब्रह्मलोकोंमें ले जाता है। वे उन ब्रह्मलोकोंमें अनन्त संवत्सरपर्यन्त रहते हैं! उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती ॥ १५ ॥
| ते, के ? य एवं यथोक्तं पञ्चाग्निदर्शनमेतद् विदुः। एवंशब्दादग्निसमिद्धूमार्चिरङ्गारविस्फुलिङ्गश्रद्धादिविशिष्टाः पञ्चाग्नयो निर्दिष्टाः, तानेवमेतान् पञ्चाग्नीन् विदुरित्यर्थः। <br><br> नन्वग्निहोत्राहुतिदर्शनविषयमेवैतद् दर्शनम्। तत्र ह्युक्तमुत्क्रा- | वे, कौन ? जो इस प्रकार इस पञ्चाग्नि विद्याको जानते हैं। 'एवम्' शब्दसे अग्नि, समिध्, धूम, ज्वाला, अङ्गार, विस्फुलिङ्ग और श्रद्धादिविशिष्ट पाँचों अग्नियोंका निर्देश किया गया है। उन इन पाँच अग्नियोंको जो इस प्रकार जानते हैं-ऐसा इसका तात्पर्य है। <br><br> शङ्का¹-किंतु यह दर्शन तो अग्निहोत्रकी आहुतियोंके दर्शनके विषयमें ही है। वहीं उत्क्रान्ति |
१. 'एवं' शब्द प्रकृत पञ्चाग्नियोंका ही परामर्श करता है—इस बातको स्पष्ट करनेके लिये यह शङ्का उठायी जाती है।
१३०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३०४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| न्त्यादिपदार्थषट्कनिर्णये दिवमेवाहवनीयं कुर्वति इत्यादि । इहाप्यमुष्य लोकस्याग्नित्वमादित्यस्य च समिच्चमित्यादि बहुसाम्यम् । तस्मात्तच्छेषमेवैतद्दर्शनमिति । | आदि छः पदार्थोंका निर्णय करते हुए 'द्युलोकको ही आहवनीय करते हैं' इत्यादि कहा गया है। यहाँ भी उस द्युलोकका अग्नित्व और आदित्यका समित्त्व इत्यादि उससे बहुत कुछ साम्य है; अतः यह विद्या उस अग्निहोत्राहुतिदर्शनका ही शेष है। | | न, यतिथ्यामिति प्रश्नप्रतिवचनपरिग्रहात् । यतिथ्यामित्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनस्य यावदेव परिग्रहस्तावदेवैवं शब्देन पराम्रष्टुं युक्तम्; अन्यथा प्रश्नानर्थक्यान्निर्ज्ञातत्वाच्च संख्याया अग्नय एव वक्तव्याः । | समाधान—नहीं, क्योंकि इस ('एवं'शब्द) से 'यतिथ्याम्' इत्यादि प्रश्न और उसका उत्तर ग्रहण किये गये हैं। 'यतिथ्याम्' इत्यादि प्रश्न और उत्तरका जितना भी परिग्रह है, उतना ही 'एवम्' शब्दसे परामर्श करना उचित है, नहीं तो यह प्रश्न व्यर्थ हो जायगा; तथा अग्निहोत्र-सम्बन्धी पदार्थोंकी संख्या तो अच्छी तरहसे ज्ञात ही है, इसलिये अग्नियोंका ही निर्देश करना उचित है। | | अथ निर्ज्ञातमप्यनूद्यते । | शङ्का—अच्छी तरहसे ज्ञात विषयका भी तो अनुवाद किया जाता है। | | यथाप्राप्तस्यैवानुवदनं युक्तं न त्वसौ लोकोऽग्निरिति । | समाधान—अनुवाद तो जो पदार्थ जैसा प्राप्त है, उसका उसी प्रकार करना उचित होता है, ऐसा नहीं कि वह द्युलोक अग्नि है।¹ |
१. क्योंकि वास्तवमें तो द्युलोक अग्नि है नहीं; इसलिये यह अग्निके स्वरूप-का अनुवाद नहीं हो सकता। यहाँ तो द्युलोकमें अग्निदृष्टि ही विवक्षित है।
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३०५ |
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३०५ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| अथोपलक्षणार्थः । | **शङ्का—**यह द्युलोकादिवाद अन्तरिक्षादिके उपलक्षणके लिये हो सकता है। |
| तथाप्याद्येनान्त्येन चोपलक्षणं युक्तम् । | **समाधान—**तब भी या तो आरम्भके अथवा अन्तके पर्यायसे उपलक्षण होना उचित है।^१ |
| श्रुत्यन्तराच्च—समाने हि प्रकरणे छान्दोग्ये तौ 'पञ्चाग्नीन् वेद' इति पञ्चसंख्याया एवोपादानादनग्निहोत्रशेषमेतत् पञ्चाग्निदर्शनम्। यच्चाग्निसमिदादिसामान्यं तदग्निहोत्रस्तुत्यर्थमित्यवोचाम। तस्मान्नोत्क्रान्त्यादिपदार्थषट्कपरिज्ञानादर्चिरादिप्रतिपत्तिः। एवमिति प्रकृतोपादानेनार्चिरादिप्रतिपत्तिविधानात्। | श्रुत्यन्तरसे भी यही बात सिद्ध होती है। इसीके समान प्रकरणमें छान्दोग्य-श्रुतिमें 'पञ्चाग्नीन् वेद' इस प्रकार 'पाँच' संख्याका ही ग्रहण करनेके कारण यह पञ्चाग्नि-दर्शन अग्निहोत्रका शेष नहीं हो सकता। तथा इसका जो अग्नि और समिधादिरूप साम्य है, वह तो अग्निहोत्रकी स्तुतिके लिये है—ऐसा हम कह चुके हैं। अतः उत्क्रान्ति आदि छह् पदार्थोंके ज्ञानसे ही अर्चि आदि मार्गकी प्राप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि यहाँ 'एवम्' इस शब्दसे प्रकृतके ग्रहणद्वारा अर्चि आदि मार्गकी प्राप्तिका विधान किया गया है। |
| के पुनस्ते य एवं विदुर्गृहस्था एव। ननु तेषां यज्ञादिसाधनेन धूमादिप्रतिपत्तिर्विधित्सिता। न, अनेवंविदामपि गृहस्थानां यज्ञादि- | किंतु जो इस प्रकार जानते हैं, वे कौन हैं ? केवल गृहस्थ। [शङ्का—] किंतु उनके लिये तो यज्ञादि साधनके द्वारा धूमादिमार्गकी प्राप्तिका विधान करना है। [ उत्तर— ] नहीं, क्योंकि जो गृहस्थ इस प्रकार जाननेवाले नहीं हैं, उनके लिये भी |
१. पाँच पर्यायों (पञ्चाग्नियों) का वर्णन करनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी।
१३०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| साधनोपपत्तेः; भिक्षुवानप्रस्थयोश्चारण्यसम्बन्धेन ग्रहणात्, गृहस्थकर्मसंबद्धत्वाच्च पञ्चाग्निदर्शनस्य। अतो नापि ब्रह्मचारिण एवं विदुरिति गृह्यन्ते, तेषां तूत्तरे पथि प्रवेशः स्मृतिप्रामाण्यात्— <br> “अष्टाशीतिसहस्राणामृषीणामूर्ध्वरेतसाम्। उत्तरेणार्यम्णः पन्थास्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे” इति। | यज्ञादि साधन हो सकते हैं, तथा संन्यासी और वानप्रस्थका अरण्यके सम्बन्धसे ग्रहण किया गया है, इसके सिवा पञ्चाग्निदर्शनका सम्बन्ध भी गृहस्थके ही कर्मसे है। अतः 'एवं विदुः' इस वाक्यसे ब्रह्मचारी भी ग्रहण नहीं किये जा सकते। उनका तो इस स्मृतिके प्रमाणसे उत्तरमार्गमें प्रवेश होता है— <br> “अट्ठासी सहस्र ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) ऋषियोंका मार्ग सूर्यके उत्तरकी ओर है; वे आपेक्षिक अमृतत्वको ही प्राप्त करते हैं!” | | तस्माद् ये गृहस्था एवमग्निजोऽहमग्न्यपत्यमित्येवं क्रमेणाग्निभ्यो जातोऽग्निरूप इत्येवं ये विदुस्ते च ये चामी अरण्ये वानप्रस्थाः परिव्राजकाश्चारण्यनित्याः श्रद्धां श्रद्धायुक्ताः सन्तः सत्यं ब्रह्म हिरण्यगर्भात्मानमुपासते न पुनः श्रद्धां चोपासते ते सर्वेऽर्चिरभिसंभवन्ति। | इसलिये जो गृहस्थ इस प्रकार 'मैं अग्नि ज—अग्निका पुत्र हूँ, इस तरह क्रमशः अग्नियोंसे उत्पन्न हुआ अग्निरूप ही हूँ'—ऐसा जानते हैं, वे और जो ये वनमें—निरन्तर वनमें रहनेवाले वानप्रस्थ और संन्यासी 'श्रद्धाम्'—श्रद्धायुक्त होकर सत्य—ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भकी उपासना करते हैं, 'श्रद्धाम्' शब्दसे श्रद्धाकी उपासना करते हैं--ऐसा नहीं समझना चाहिये, वे सब अर्चिरादिमार्गको प्राप्त होते हैं। | | यावद् गृहस्थाः पञ्चाग्निविद्यां सत्यं वा ब्रह्म न विदुस्तावच्छ्रद्धाद्या- | जबतक गृहस्थलोग पञ्चाग्निविद्या अथवा सत्य ब्रह्मको नहीं जानते, तबतक वे श्रद्धादि आहुतियोंके क्रमसे |
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १३०७ |
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १३०७ | | :--- | :--- |
| हुतिक्रमेण पञ्चम्यामाहुतौ हुतायां ततो योषाग्नेर्जाताः पुनर्लोकं प्रत्युत्थायिनोऽग्निहोत्रादिकर्मानुष्ठातारो भवन्ति । तेन कर्मणा धूमादिक्रमेण पुनः पितृलोकं पुनः पर्जन्यादिक्रमेणेममावर्तन्ते । ततः पुनर्योषाग्नेर्जाताः पुनः कर्म कृत्वेत्येवमेव घटीयन्त्रवद् गत्यागतिभ्यां पुनः पुनरावर्तन्ते । | पांचवीं आहुतिके हवन किये जानेपर उससे स्त्रीरूप अग्निमें उत्पन्न होकर फिर लोकमें उत्थान करनेवाले होकर अग्निहोत्रादि कर्मका अनुष्ठान करनेवाले होते हैं । उस कर्मके द्वारा वे धूमादि क्रमसे पुनः पितृलोकमें जाते हैं और पर्जन्यादि क्रमसे पुनः इस लोकमें लौट आते हैं । उससे पुनः स्त्रीरूप अग्निमें उत्पन्न होकर फिर कर्म करके [पितृलोकमें जाते हैं] । इस प्रकार घटीयन्त्र ( रहट ) के सदृश गमनागमनद्वारा बारम्बार जाते-आते रहते हैं । | | यदा त्वेवं विदुस्ततो घटीयन्त्रभ्रमणाद् विनिर्मुक्ताः सन्तोऽर्चिरभिसंभवन्ति । अर्चिरिति नाग्निज्वालामात्रम्, किं तर्हि ? अर्चिरभिमानिन्यर्चिःशब्दवाच्या देवतैवोत्तरमार्गलक्षणा व्यवस्थितैव तामभिसंभवन्ति । न हि परिव्राजकानामग्न्यर्चिषैव साक्षात्सम्बन्धोऽस्ति । तेन देवतैव परिगृह्यतेऽर्चिःशब्दवाच्या । | किंतु जब वे ऐसा जानते हैं, तो इस घटीयन्त्रके समान चक्कर काटनेसे छूटकर अर्चिको प्राप्त होते हैं । यह अर्चि भी अग्निकी ज्वालामात्र नहीं है; तो क्या है ? अर्चिके अभिमानी अर्चिशब्दवाच्य देवता है, जो उत्तरमार्गरूप और स्थिर ही हैं, उन्हें ये प्राप्त होते हैं । परिव्राजकोंका तो अग्निकी अर्चि ( ज्वाला ) से साक्षात् सम्बन्ध भी नहीं है, इसलिये यहाँ अर्चिशब्दवाच्य देवता ही ग्रहण किये जाते हैं । | | अतोऽहर्देवताम्; मरणकालनियमानुपपत्तेरहःशब्दोऽपि देव- | यहाँसे वे अहर्देवता ( दिनाभिमानी देवता ) को प्राप्त होते हैं । मरणकालका कोई नियम नहीं हो सकता, इसलिये अहःशब्दसे भी |
१३०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तैव । आयुषः क्षये हि मरणम्, न ह्येवंविदाहन्येव मर्तव्यमित्यहर्मरणकालो नियन्तुं शक्यते । न च रात्रौ प्रेताः सन्तोऽहः प्रतीक्षन्ते; "स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छति" ( छा० उ० ८ । ६ । ५) इति श्रुत्यन्तरात् ।<br><br>अह्न आपूर्यमाणपक्षमहर्देवतयातिवाहिता आपूर्यमाणपक्षदेवतां प्रतिपद्यन्ते शुक्लपक्षदेवतामित्येतत् । आपूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ्ङुत्तरां दिशमादित्यः सवितैति तान् मासान् प्रतिपद्यन्ते शुक्लपक्षदेवतयातिवाहिताः सन्तः । मासानिति बहुवचनात् संघचारिण्यः षडुत्तरायणदेवताः । | देवता ही अभिप्रेत हैं [ साक्षात् दिन नहीं ] । आयुके क्षीण होनेपर ही मरण होता है, इस पञ्चाग्नि-उपासकको दिनमें ही मरना चाहिये-इस प्रकार उसके लिये दिनरूप मरणकालका नियम नहीं किया जा सकता । रात्रिमें मरे हुए उपासक [ आगे जानेके लिये ] दिनकी प्रतीक्षा करते हों-ऐसी बात भी नहीं है "जितनी देरमें मन आदित्य-के पास जाता है, उतनी ही देरमें यह आदित्यलोकमें पहुँच जाता है" इस अन्य श्रुतिसे यही सिद्ध होता है ।<br><br>'अह्न आपूर्यमाणपक्षम्'-अहर्देवता-से ऊपर ले जाये जानेपर वे आपूर्य-माणपक्षदेवताको अर्थात् शुक्लपक्ष-देवताको प्राप्त होते हैं । आपूर्यमाण-पक्षदेवतासे जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तर दिशाकी ओर चलता है, उन मासोंको, शुक्लपक्षदेवताद्वारा अपने अधिकारसे बाहर ऊपर पहुँचाये जानेपर, प्राप्त होते हैं ।' 'मासान्' ऐसा बहुवचन होनेके कारण छः उत्तरायण-देवता संघचारी ( मिलकर रहनेवाले ) हैं । |
ब्राह्मण २] \hfill शाङ्करभाष्यार्थे \hfill १३०९
ब्राह्मण २] \hfill शाङ्करभाष्यार्थे \hfill १३०९
| तेभ्यो मासेभ्यः षण्मासदेवता-<br>भिरतिवाहिता देवलोकाभिमा-<br>निनीं देवतां प्रतिपद्यन्ते ।<br>देवलोकादादित्यमादित्याद् वैद्युतं<br>विद्युदभिमानिनीं देवतां प्रति-<br>पद्यन्ते । विद्युद्देवतां प्राप्तान् ब्रह्म-<br>लोकवासी पुरुषो ब्रह्मणा मनसा<br>सृष्टो मानसः कश्चिदेत्यागत्य<br>ब्रह्मलोकान् गमयति । | उन मासोंसे अर्थात् छः मास-<br>देवताओंसे ऊपर ले जाये जानेपर<br>वे देवलोकाभिमानी देवताको प्राप्त<br>होते हैं। देवलोकसे आदित्यको<br>और आदित्यसे वैद्युत-विद्युदभिमानी<br>देवताको प्राप्त होते हैं। विद्युद्देव-<br>ताको प्राप्त हुए इन उपासकोंको<br>ब्रह्माके द्वारा मनसे रचा हुआ कोई<br>ब्रह्मलोकवासी मानस पुरुष आकर<br>ब्रह्मलोकोंको ले जाता है। |
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| ब्रह्मलोकानित्यधरोत्तरभूमि-<br>भेदेन भिन्ना इति गम्यन्ते, बहु-<br>वचनप्रयोगात्; उपासनतार-<br>तम्योपपत्तेश्च; ते तेन पुरुषेण<br>गमिताः सन्तःस्तेषु ब्रह्मलोकेषु<br>पराः प्रकृष्टाः सन्तः स्वयं परा-<br>वतः प्रकृष्टाः समाः संवत्सरान-<br>नेकान् वसन्ति । ब्रह्मणोऽनेकान्<br>कल्पान् वसन्तीत्यर्थः । तेषां<br>ब्रह्मलोकं गतानां नास्ति पुनरा-<br>वृत्तिरस्मिन् संसारे न पुनराग-<br>मनमिहेति शाखान्तरपाठात् । | ‘ब्रह्मलोकान्’ ऐसा बहुवचन<br>प्रयोग होनेसे ज्ञात होता है कि<br>नीचे-ऊपरकी भूमिके भेदसे ब्रह्म-<br>लोकोंमें भेद है। उपासनाके तार-<br>तम्यसे भी ऐसा भेद होना सम्भव<br>है। उस पुरुषके द्वारा पहुँचाये हुए<br>उन लोकोंमें वे स्वयं ‘पराः’—प्रकृष्ट<br>होकर ‘परावतः’ प्रकृष्ट संवत्सर<br>अर्थात् अनेक वर्षतक रहते हैं।<br>तात्पर्य यह है कि ब्रह्माके अनेकों<br>कल्पपर्यन्त रहते हैं। उन ब्रह्मलोक-<br>को गये हुए पुरुषोंकी पुनरावृत्ति<br>नहीं होती अर्थात् इस संसारमें<br>पुनरागमन नहीं होता, क्योंकि ‘इह<br>न पुनरावृत्तिः’ ऐसा दूसरी शाखा-<br>का पाठ है। |
| १३१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| १३१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| Sanskrit | Hindi |
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| इहेत्याकृतिमात्रग्रहणमिति चेच्छ्वोभूते पौर्णमासीमिति यद्वत्। | **पूर्व०—**किंतु 'इह' पदसे तो आकृतिमात्रका ग्रहण होता है अर्थात् केवल इसी संसारका नहीं, सामान्यतः सभी कल्पके संसारका ग्रहण होता है। जैसे 'प्रातःकाल होनेपर पौर्णमास याग करे' इस वाक्यमें सामान्यतः सभी प्रातःकालका ग्रहण होता है। |
| न, इहेतिविशेषणानर्थक्यात्। यदि हि नावर्तन्त एवेहग्रहणमनर्थकमेव स्यात्। श्वोभूते पौर्णमासीमित्यत्र पौर्णमास्याः श्वोभूतत्वमनुक्तं न ज्ञायत इति युक्तं विशेषयितुम्। न हि तत्र श्वआकृतिः शब्दार्थो विद्यत इति श्वःशब्दो निरर्थक एव प्रयुज्यते; यत्र तु विशेषणशब्दे प्रयुक्तेऽन्विष्यमाणे विशेषणफलं चेन्न गम्यते | **सिद्धान्ती—**नहीं; ऐसा माननेसे 'इह' यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा। यदि उनकी कभी पुनरावृत्ति होती ही नहीं, तो 'इह' ( इस कल्पके संसारमें ) यह विशेषण निरर्थक ही होगा।^१ 'प्रातःकाल होनेपर पौर्णमास याग करे' इस वाक्यमें तो 'प्रातःकाल' यह विशेषण यदि शब्दतः कहा न जाय, तो अपने-आप उसका ज्ञान नहीं हो सकता; इसलिये वहाँ विशेषण लगाना उचित ही है। यदि वहाँ भी श्वः ( प्रभात ) का शब्दार्थ सामान्यतः प्रभातकाल मात्र न हो तो 'श्व' शब्दका प्रयोग भी निरर्थक ही समझा जायगा। जहाँ विशेषण शब्दका प्रयोग तो हो, पर खोजनेसे उसका कोई फल न प्रतीत हो, |
१. क्योंकि पुनरावृत्ति संसारमें ही होती है, अतः 'इह' पदका प्रयोग किये बिना भी उसका बोध हो जाता।
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३११ |
| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३११ |
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| तत्र युक्तो निरर्थकत्वेनोत्स्रष्टुं विशेषणशब्दो न तु सत्यां विशेषणफलावगतौ । तस्मादस्मात्कल्पादूर्ध्वमावृत्तिर्गम्यते ॥१५॥ | वहां व्यर्थ होनेके कारण उस विशेषणका परित्याग कर देना ही उचित है, विशेषणके फलका बोध होनेपर उसको त्यागना उचित नहीं है। इसलिये [ 'इस संसारमें' ऐसा विशेषण लगानेके कारण ] यह सूचित होता है कि इस कल्पके बाद उसकी पुनरावृत्ति हो सकती है ॥१५॥¹ |
धूमयानमार्गका वर्णन तथा द्वितीय और तृतीय प्रश्नका उत्तर
अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिँ रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणादित्य एति मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चन्द्रं ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति ताँस्तत्र देवा यथा सोमँ राजानमाप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनाँस्तत्र भक्षयन्ति तेषां यदा तत् पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद् वायुं वायोर्वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ जायन्ते लोकान् प्रत्युत्थायिनस्त
१. यहाँ जो ब्रह्मलोकसे पुनरागमनकी बात कही है, उससे यह नहीं समझना चाहिये कि वे फिर संसारबन्धनमें पड़ जाते हैं। उनका पुनरागमन भगवत्प्रेरणासे विश्वकी प्रवृत्तिका नियन्त्रण और संचालन करनेके लिये अथवा भगवान्की अवतार-लीलाओंके परिकररूपसे होता है। वे जन्म लेकर भी मुक्त ही रहते हैं। नारद, वसिष्ठ और अर्जुन आदि महात्मा एवं भगवत्पार्षद इसी कोटिमें कहे जा सकते हैं। इनका जन्म कर्मबन्धनसे नहीं होता, बल्कि भगवत्कार्यके संचालनके लिये होता है।
१३१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६
| १३१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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एवमेवानुपरिवर्तन्ते अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १६ ॥
और जो यज्ञ, दान, तपके द्वारा लोकोंको जीतते हैं, वे धूम (धूमाभिमानी देवता ) को प्राप्त होते हैं। धूमसे रात्रिदेवताको, रात्रिसे अपक्षीयमाण पक्ष (कृष्णपक्षाभिमानी देवता) को, अपक्षीयमाण पक्षसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिणकी ओर होकर जाता है, उन छः मासके देवताओंको, छः मासके देवताओंसे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। चन्द्रमामें पहुँचकर वे अन्न हो जाते हैं। वहाँ जैसे ऋत्विग्गण सोम राजाको 'आप्यायस्व अपक्षीयस्व' ऐसा कहकर चमसमं भरकर पी जाते हैं, उसी प्रकार इन्हें देवगण भक्षण कर जाते हैं। जब उनके कर्म क्षीण हो जाते हैं, तो वे इस आकाशको ही प्राप्त होते हैं। आकाशसे वायुको, वायुसे वृष्टिको और वृष्टिसे पृथिवीको प्राप्त होते हैं। पृथिवीको प्राप्त होकर वे अन्न हो जाते हैं। फिर वे पुरुषरूप अग्निमें हवन किये जाते हैं। उससे वे लोकके प्रति उत्थान करनेवाले होकर स्त्रीरूप अग्निमें उत्पन्न होते हैं। वे इसी प्रकार पुनः-पुनः परिवर्तित होते रहते हैं और जो इन दोनों मार्गोंको नहीं जानते, वे कीट, पतंग और डाँस-मच्छर आदि होते हैं॥ १६॥
| अथ पुनर्ये नैवंविदुरूत्क्रान्त्याद्यग्निहोत्रसम्बन्धपदार्थषट्कस्यैव वेदितारः केवलकर्मिणो यज्ञेनाग्निहोत्रादिना दानेन बहिर्वेदि भिक्षमाणेषुद्रव्यसंविभागलक्षणेन तपसा बहिर्वेद्येव दीक्षादिव्यतिरिक्तेन कृच्छ्रचान्द्रायणादिना लोकाञ्जयन्ति, लोकानिति बहुवचनात्तत्रापि फलतारतम्यमभिप्रेतम्, | और जो इस प्रकार नहीं जानते, उत्क्रान्ति आदि अग्निहोत्रसम्बन्धी छः पदार्थोंको ही जाननेवाले केवल कर्मी हैं; तथा अग्निहोत्रादि यज्ञ, वेदीसे बाहर भिक्षा माँगनेवालोंको द्रव्य बाँटनारूप दान एवं वेदीके बाहर ही दीक्षादिसे अतिरिक्त कृच्छ्रचान्द्रायणादिरूप तपके द्वारा लोकोंको जीतते हैं, 'लोकान्' ऐसा बहुवचन होनेके कारण वहां भी फलका तारतम्य माना गया है, |
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ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३१३
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३१३
| ते धूममभिसम्भवन्ति । उत्तरमार्ग इवेहापि देवता एव धूमादिशब्दवाच्याः, धूमदेवतां प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः। आतिवाहिकत्वं च देवतानां तद्वदेव । | वे धूमको प्राप्त होते हैं। उत्तरमार्गके समान यहाँ भी देवता ही धूमादिशब्दवाच्य हैं, तात्पर्य यह है कि वे धूमदेवताको प्राप्त होते हैं। इन देवताओंकी आतिवाहिकता भी उन्हीं ( उत्तरमार्गीय देवताओं ) के समान है। | | धूमाद् रात्रिं रात्रिदेवतां ततोऽपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षदेवतां ततो यान् षण्मासान् दक्षिणां दिशमादित्य एति तान् मासदेवताविशेषान् प्रतिपद्यन्ते। | धूमसे रात्रि अर्थात् रात्रिदेवताको, वहाँसे कृष्णपक्ष यानी कृष्णपक्षाभिमानी देवताको और वहाँसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिणदिशामें होकर चलता है, उन मासदेवताविशेषोंको प्राप्त होते हैं। | | मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चन्द्रम् । ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्रान्नभूतान् यथा सोमं राजानमिह यज्ञे ऋत्विज आप्यायस्वापक्षीयस्वेति भक्षयन्त्येवमेनांश्चन्द्रं प्राप्तान् कर्मिणो भृत्यानिव स्वामिनो भक्षयन्त्युपभुञ्जते देवाः । | मासदेवताओंसे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको जाते हैं। उस चन्द्रमामें पहुँचकर वे अन्न हो जाते हैं। 'तांस्तत्र अन्नभूतान्'—जिस प्रकार यहाँ यज्ञमें ऋत्विज् लोग 'आप्यायस्व अपक्षीयस्व' ऐसा कहकर सोम राजाको भक्षण करते हैं, इसी प्रकार चन्द्रमाको प्राप्त हुए इन अन्नभूत कर्मियोंको, स्वामी जिस प्रकार सेवकोंसे सेवा कराते हैं, उसी प्रकार देवतालोग भक्षण करते अर्थात् उनका उपभोग करते हैं। | | आप्यायस्वापक्षीयस्वेति न मन्त्रः किं तर्हि ? आप्याय्याप्याय्य | 'आप्यायस्व अपक्षीयस्व' यह कोई मन्त्र नहीं है; तो फिर क्या है ? तात्पर्य यह हे कि सोमको चमसमें |
बृ० उ० ८३—
१३१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६
| १३१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| चमसस्थं भक्षणेनापक्षयं च कृत्वा पुनः पुनर्भक्षयन्तीत्यर्थः । एवं देवा अपि सोमलोके लब्धशरीरान् कर्मिण उपकरणभूतान् पुनः पुनर्विश्रामयन्तः कर्मानुरूपं फलं प्रयच्छन्तः, तद्धि तेषामाप्यायनं सोमस्याप्यायनमिवोपभुञ्जत उपकरणभूतान् देवाः । | 'आप्याय आप्याय' भर-भरकर उसका भक्षणके द्वारा अपक्षय करके पुनः-पुनः भक्षण करते हैं। इसी प्रकार जिन्हें चन्द्रलोकमें शरीर प्राप्त हुआ है, उन अपने उपकरणभूत कर्मियोंको देवता भी पुनः-पुनः विश्राम देते हुए—उन्हें कर्मानुरूप फल देते हुए, क्योंकि सोमके आप्यायनके समान यही उनका आप्यायन है—इस प्रकार [ आप्यायन करके ] उन अपने उपकरणभूत कर्मठोंका देवगण उपभोग ( उपयोग ) करते हैं। | | तेषां कर्मिणां यदा यस्मिन् काले तद् यज्ञदानादिलक्षणं सोमलोकप्रापकं कर्म पर्यवैति परिगच्छति परिक्षीयत इत्यर्थः, अथ तदेममेव प्रसिद्धमाकाशमभिनिष्पद्यन्ते । यास्ताः श्रद्धाशब्दवाच्या द्युलोकाग्नौ हुता आपः सोमाकारपरिणता याभिः सोमलोके कर्मिणामुपभोगाय शरीरमारब्धमम्मयं ताः कर्मक्षयाद्धिमपिण्ड इवातपसम्पर्कात् प्रविलीयन्ते । प्रविलीनाः सूक्ष्मा | जब अर्थात् जिस समय उन कर्मियोंका उन्हें सोमलोककी प्राप्ति करानेवाला यज्ञ-दानादिरूप कर्म 'पर्यवैति'—सब ओरसे चला जाता अर्थात् परिक्षीण हो जाता है तो फिर वे इस प्रसिद्ध आकाशको ही अभिनिष्पन्न हो जाते हैं। जो कि वह द्युलोकाग्निमें हवन किया हुआ श्रद्धाशब्दवाच्य आप सोमके आकारमें परिणत हुआ रहता है, जिसके द्वारा सोमलोकमें कर्मियोंका जलमय शरीर आरम्भ किया जाता है, वह आप कर्मोंका क्षय होनेपर, घामके सम्पर्कसे बर्फके डलेके समान, पिघल जाता है। वह पिघलकर सूक्ष्म अर्थात् |
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१५
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| आकाशभूता इव भवन्ति । तदिदमुच्यत इममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त इति । | आकाशभूत-सा हो जाता है । इसीसे यह कहा जाता है कि वे इस प्रसिद्ध आकाशको ही अभिनिष्पन्न होते हैं । |
| ते पुनरपि कर्मिणस्तच्छरीराः सन्तः पुरोवातादिना इतश्चामुतश्च नीयन्तेऽन्तरिक्षगास्तदाह—आकाशाद् वायुमिति । वायोर्वृष्टिं प्रतिपद्यन्ते; तदुक्तम्—पर्जन्याग्नौ सोमं राजानं जुह्वतीति । ततो वृष्टिभूता इमां पृथिवीं पतन्ति । ते पृथिवीं प्राप्य व्रीहियवाद्यन्नं भवन्ति, तदुक्तमस्मिँल्लोकेऽग्नौ वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुत्या अन्नं सम्भवतीति । | वे आकाशशरीर हुए कर्मी फिर भी पूर्ववायु आदिसे अन्तरिक्षमें इधर-उधर ले जाये जाते हैं, इसीसे श्रुति कहती है—'आकाशसे वायुको प्राप्त होते हैं ।' 'वायुसे वृष्टिको प्राप्त होते हैं', इसीसे ऊपर कहा है--'देवगण पर्जन्याग्निमें सोम राजाको हवन करते हैं ।' वहाँसे वे वृष्टिरूप होकर पृथिवीपर गिरते हैं । पृथिवीपर पहुँचकर वे व्रीहि एवं यवादि अन्न हो जाते हैं, इसीसे कहा है--'देवतालोग इस लोकरूप अग्निमें वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न होता है ।' |
| ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्तेऽन्नभूता रेतस्सिचि; ततो रेतोभूता योषाग्नौ हूयन्ते; ततो जायन्ते लोकं प्रत्युत्थायिनस्ते लोकं प्रत्युत्तिष्ठन्तोऽग्निहोत्रादिकर्मानुतिष्ठन्ति । ततो धूमादिना पुनः पुनः सोमलोकं पुनरिमं लोक- | अन्न होनेपर वे वीर्याधान करनेवाले पुरुषरूप अग्निमें हवन किये जाते हैं; फिर वीर्यरूप हुए स्त्रीरूप अग्निमें होम किये जाते हैं; तदनन्तर वे परलोकगमनके लिये उद्यत होकर जन्म लेते हैं; वे परलोकके प्रति उद्यत होकर अग्निहोत्रादि कर्मका अनुष्ठान करते हैं । फिर धूमादिके क्रमसे पुनः-पुनः सोमलोकको और पुनः इस लोकको |
| १३१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| १३१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मिति। त एवं कर्मिणोऽनुपरिवर्तन्ते घटीयन्त्रवच्चक्रीभूता बंभ्रमतीत्यर्थः—उत्तरमार्गाय सद्योमुक्तये वा यावद् ब्रह्म न विदुः। "इति नु कामयमानः संसरति" इत्युक्तम्। | प्राप्त होते रहते हैं। वे कर्मीलोग इस प्रकार निरन्तर आते-जाते रहते हैं अर्थात् घटीयन्त्रके समान चक्राकार होकर घूमते रहते हैं, जबतक वे ब्रह्मको नहीं जानते तबतक उत्तरमार्ग अथवा सद्योमुक्तिके लिये इसी प्रकार भ्रमते रहते हैं। [ चतुर्थ अध्यायमें ] 'कामना करनेवाला इस प्रकार संसरित होता रहता है' ऐसा कहा भी है। |
| अथ पुनर्य उत्तरं दक्षिणं चैतौ पन्थानौ न विदुरुत्तरस्य दक्षिणस्य वा पथः प्रतिपत्तये ज्ञानं कर्म वा नानुतिष्ठन्तीत्यर्थः। ते किं भवन्ति ? इत्युच्यते—ते कीटाः पतङ्गा यदिदं यच्चेदं दन्दशूकं दंशमशकमित्येतद् भवन्ति। एवं हीयं संसारगतिः कष्टा, अस्यां निमग्नस्य पुनरुद्धार एव दुर्लभः; तथा च श्रुत्यन्तरम् — "तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्व" (छा० उ० ५।१०।८) इति। | और जो उत्तर या दक्षिण—इन दोनों ही मार्गोंको नहीं जानते, अर्थात् उत्तर या दक्षिण मार्गकी प्राप्तिके लिये ज्ञान अथवा कर्मका अनुष्ठान नहीं करते, वे क्या होते हैं, सो कहा जाता है। वे कीट, पतंग और जो ये दन्दशूक अर्थात् डाँस और मच्छर आदि हैं, होते हैं। इस प्रकार यह संसारगति बड़ी कष्टमयी है। इसमें डूबे हुएका पुनः उद्धार होना ही दुर्लभ है। ऐसी ही एक अन्य श्रुति भी है—"वे ये क्षुद्र और निरन्तर आने-जानेवाले जीव होते हैं, जन्म लो और मर जाओ [—ऐसा उनका तीसरा स्थान होता है]।" |
| तस्मात् सर्वोत्साहेन यथाशक्ति स्वाभाविककर्मज्ञानहानेन दक्षिणोत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं शास्त्रीयं कर्म ज्ञानं वानुतिष्ठे- | अतः स्वाभाविक कर्म और ज्ञानको छोड़कर पूर्ण उत्साहके साथ यथाशक्ति दक्षिण और उत्तरमार्गोंकी प्राप्तिके साधनभूत शास्त्रीय कर्म और |
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १३१७
ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १३१७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| दिति वाक्यार्थः। तथा चोक्तम्— “अतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरम्” (छा० उ० ५। १०। ६) “तस्माज्जुगुप्सेत” (छा० उ० ५। १०। ८) इति श्रुत्यन्तरान्मोक्षाय प्रयतेतेत्यर्थः। अत्राप्युत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधन एव महान् यत्नः कर्तव्य इति गम्यते। एवमेवानुपरिवर्तन्त इत्युक्तत्वात्। | शास्त्रीय ज्ञान (उपासना) का अनुष्ठान करे—ऐसा इस वाक्यका तात्पर्य है। ऐसा ही कहा भी है—“अतः इस व्रीहि-यवादिभावसे छूटना बड़ा कठिन है” “इसलिये इससे बचता रहे” इन दूसरी श्रुतियोंसे तात्पर्य यही है कि मोक्षके लिये प्रयत्न करे। उनमें भी उत्तरमार्गकी प्राप्तिके साधनमें ही महान् यत्न करना चाहिये—ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि [ धूमादि मार्गके विषयमें ] यह कहा गया है कि ‘वे इस प्रकार निरन्तर आते-जाते रहते हैं।’ |
| एवं प्रश्नाः सर्वे निर्णीताः; ‘असौ वै लोकः’ इत्यारभ्य पुरुषः सम्भवति’ इति चतुर्थः प्रश्नः ‘यतिथ्यामाहुत्याम्’ इत्यादिः प्राथम्येन। पञ्चमस्तु द्वितीयत्वेन देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वेति दक्षिणोत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनकथनेन। तेनैव च प्रथमोऽपि। अग्नेरारभ्य केचिदर्चिः प्रति- | इस प्रकार सब प्रश्नोंका निर्णय हो गया। ‘असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम’ यहाँसे लेकर ‘पुरुषः सम्भवति’ इस स्थलतक ‘यतिथ्यामाहुत्याम्’ इत्यादि चतुर्थ प्रश्नका पहले उत्तर दिया गया है। ‘देवयान-मार्गकी प्राप्तिका साधन तथा पितृयानका साधन क्या है? इस पञ्चम प्रश्नका दक्षिण और उत्तर मार्गकी प्राप्तिके साधन बतलाकर द्वितीय उत्तरद्वारा निर्णय किया है। उसीसे प्रथम प्रश्नका भी उत्तर हो जाता है। [ अन्त्येष्टि-संस्कारके समय ] अग्निमें डाले जानेपर फिर वहाँसे कोई अर्चिरादि मार्गको प्राप्त |
१. पहला प्रश्न था ‘क्या तू जानता है कि यह प्रजा मरकर किस प्रकार विभिन्न मार्गोंको प्राप्त होती है?’ उसका किस प्रकार निर्णय हुआ है—यह इस वाक्यसे बतलाया जाता है।