भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1321, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1321
ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ१३०५

संस्कृतहिन्दी
अथोपलक्षणार्थः ।**शङ्का—**यह द्युलोकादिवाद अन्तरिक्षादिके उपलक्षणके लिये हो सकता है।
तथाप्याद्येनान्त्येन चोपलक्षणं युक्तम् ।**समाधान—**तब भी या तो आरम्भके अथवा अन्तके पर्यायसे उपलक्षण होना उचित है।^१
श्रुत्यन्तराच्च—समाने हि प्रकरणे छान्दोग्ये तौ 'पञ्चाग्नीन् वेद' इति पञ्चसंख्याया एवोपादानादनग्निहोत्रशेषमेतत् पञ्चाग्निदर्शनम्। यच्चाग्निसमिदादिसामान्यं तदग्निहोत्रस्तुत्यर्थमित्यवोचाम। तस्मान्नोत्क्रान्त्यादिपदार्थषट्कपरिज्ञानादर्चिरादिप्रतिपत्तिः। एवमिति प्रकृतोपादानेनार्चिरादिप्रतिपत्तिविधानात्।श्रुत्यन्तरसे भी यही बात सिद्ध होती है। इसीके समान प्रकरणमें छान्दोग्य-श्रुतिमें 'पञ्चाग्नीन् वेद' इस प्रकार 'पाँच' संख्याका ही ग्रहण करनेके कारण यह पञ्चाग्नि-दर्शन अग्निहोत्रका शेष नहीं हो सकता। तथा इसका जो अग्नि और समिधादिरूप साम्य है, वह तो अग्निहोत्रकी स्तुतिके लिये है—ऐसा हम कह चुके हैं। अतः उत्क्रान्ति आदि छह् पदार्थोंके ज्ञानसे ही अर्चि आदि मार्गकी प्राप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि यहाँ 'एवम्' इस शब्दसे प्रकृतके ग्रहणद्वारा अर्चि आदि मार्गकी प्राप्तिका विधान किया गया है।
के पुनस्ते य एवं विदुर्गृहस्था एव। ननु तेषां यज्ञादिसाधनेन धूमादिप्रतिपत्तिर्विधित्सिता। न, अनेवंविदामपि गृहस्थानां यज्ञादि-किंतु जो इस प्रकार जानते हैं, वे कौन हैं ? केवल गृहस्थ। [शङ्का—] किंतु उनके लिये तो यज्ञादि साधनके द्वारा धूमादिमार्गकी प्राप्तिका विधान करना है। [ उत्तर— ] नहीं, क्योंकि जो गृहस्थ इस प्रकार जाननेवाले नहीं हैं, उनके लिये भी

१. पाँच पर्यायों (पञ्चाग्नियों) का वर्णन करनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी।