बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1322, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| साधनोपपत्तेः; भिक्षुवानप्रस्थयोश्चारण्यसम्बन्धेन ग्रहणात्, गृहस्थकर्मसंबद्धत्वाच्च पञ्चाग्निदर्शनस्य। अतो नापि ब्रह्मचारिण एवं विदुरिति गृह्यन्ते, तेषां तूत्तरे पथि प्रवेशः स्मृतिप्रामाण्यात्— <br> “अष्टाशीतिसहस्राणामृषीणामूर्ध्वरेतसाम्। उत्तरेणार्यम्णः पन्थास्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे” इति। | यज्ञादि साधन हो सकते हैं, तथा संन्यासी और वानप्रस्थका अरण्यके सम्बन्धसे ग्रहण किया गया है, इसके सिवा पञ्चाग्निदर्शनका सम्बन्ध भी गृहस्थके ही कर्मसे है। अतः 'एवं विदुः' इस वाक्यसे ब्रह्मचारी भी ग्रहण नहीं किये जा सकते। उनका तो इस स्मृतिके प्रमाणसे उत्तरमार्गमें प्रवेश होता है— <br> “अट्ठासी सहस्र ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) ऋषियोंका मार्ग सूर्यके उत्तरकी ओर है; वे आपेक्षिक अमृतत्वको ही प्राप्त करते हैं!” | | तस्माद् ये गृहस्था एवमग्निजोऽहमग्न्यपत्यमित्येवं क्रमेणाग्निभ्यो जातोऽग्निरूप इत्येवं ये विदुस्ते च ये चामी अरण्ये वानप्रस्थाः परिव्राजकाश्चारण्यनित्याः श्रद्धां श्रद्धायुक्ताः सन्तः सत्यं ब्रह्म हिरण्यगर्भात्मानमुपासते न पुनः श्रद्धां चोपासते ते सर्वेऽर्चिरभिसंभवन्ति। | इसलिये जो गृहस्थ इस प्रकार 'मैं अग्नि ज—अग्निका पुत्र हूँ, इस तरह क्रमशः अग्नियोंसे उत्पन्न हुआ अग्निरूप ही हूँ'—ऐसा जानते हैं, वे और जो ये वनमें—निरन्तर वनमें रहनेवाले वानप्रस्थ और संन्यासी 'श्रद्धाम्'—श्रद्धायुक्त होकर सत्य—ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भकी उपासना करते हैं, 'श्रद्धाम्' शब्दसे श्रद्धाकी उपासना करते हैं--ऐसा नहीं समझना चाहिये, वे सब अर्चिरादिमार्गको प्राप्त होते हैं। | | यावद् गृहस्थाः पञ्चाग्निविद्यां सत्यं वा ब्रह्म न विदुस्तावच्छ्रद्धाद्या- | जबतक गृहस्थलोग पञ्चाग्निविद्या अथवा सत्य ब्रह्मको नहीं जानते, तबतक वे श्रद्धादि आहुतियोंके क्रमसे |