बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1318, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें१३०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६
उस इस अग्निमें देवगण पुरुषको होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष अत्यन्त दीप्तिमान् हो जाता है ॥ १४ ॥
| अथ तदैनं मृतमग्नयेऽन्त्यर्थमेवा- <br>न्त्याहुत्यै हरन्ति ऋत्विजस्तस्याहु- <br>तिभूतस्य प्रसिद्धोऽग्निरेव होमाधि- <br>करणं न परिकल्प्योऽग्निः। प्रसिद्धैव <br>समित् समिद् धूमो धूमोऽर्चिरर्चि- <br>रङ्गारा अङ्गारा विस्फुलिङ्गा विस्फु- <br>लिङ्गाः—यथाप्रसिद्धमेव सर्व- <br>मित्यर्थः । <br>तस्मिन् पुरुषमन्त्याहुतिं <br>जुह्वति। तस्या आहुत्या आहुतेः <br>पुरुषो भास्वरवर्णोऽतिशयदीप्ति- <br>मान्; निषेकादिभिरन्त्याहुत्यन्तैः <br>कर्मभिः संस्कृतत्वात् संभवति <br>निष्पद्यते ॥ १४ ॥ | तब इस मृत पुरुषको 'अग्नये'— <br>अग्नि के ही लिये अन्तिम आहुतिके <br>प्रयोजनसे ऋत्विगगण ले जाते हैं। <br>उस आहुतिभूत पुरुषका प्रसिद्ध <br>अग्नि ही होमाधिकरण होता है, <br>कोई कल्पित अग्नि नहीं। प्रसिद्ध <br>समिध् ही समिध् होती है, धूम धूम <br>होता है, ज्वाला ज्वाला होती है, <br>अङ्गारे अङ्गारे होते हैं और विस्फु- <br>लिङ्ग विस्फुलिङ्ग होते हैं। तात्पर्य <br>यह है कि ये सब जैसे प्रसिद्ध हैं वे <br>ही होते हैं। <br>उसमें पुरुषरूप अन्तिम आहु- <br>तिको होम करते हैं। उस आहुति- <br>से पुरुष भास्वरवर्ण—अत्यन्त <br>दीप्तिमान् हो जाता है; गर्भाधानसे <br>लेकर अन्त्येष्टितकके सम्पूर्ण कर्मों- <br>से संस्कारयुक्त होनेके कारण <br>वह अतिशय दीप्तिमान् हो जाता <br>है ॥ १४ ॥ |
पञ्चम प्रश्नका उत्तर—देवयानमार्गका वर्णन
| इदानीं प्रथमप्रश्ननिराकरणार्थ- <br>माह— | अब प्रथम प्रश्नका निराकरण <br>करनेके लिये राजा कहता है— |
ते य एवमेतद् विदुर्य्ये चामी अरण्ये श्रद्धाँसत्यमु- पासते तेऽर्चिरभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह आपूर्य्यमाणपक्ष-