बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1317, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३०१
| भन्ते । यः प्रश्नश्चतुर्थो वेत्थ यतिथ्यामाहुत्यां हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा समुत्थाय वदन्ती ३ इति स एष निर्णीतः; पञ्चम्यामाहुतौ योषाग्नौ हुतायां रेतोभूता आपः पुरुषवाचो भवन्तीति ।<br><br>स पुरुष एवं क्रमेण जातो जीवति । कियन्तं कालम् इत्युच्यते—यावज्जीवति यावदस्मिञ्छरीरे स्थितिनिमित्तं कर्म विद्यते तावदित्यर्थः, अथ तत्क्षये यदा यस्मिन् काले म्रियते ॥ १३॥ | करता है । 'क्या तू जानता है कि कितनी संख्यावाली आहुतिके हवन किये जानेपर आप पुरुषशब्दवाच्य होकर उठकर बोलने लगता है ?' ऐसा जो चतुर्थ प्रश्न था, उसका यह निर्णय हो गया कि योषाग्निमें पांचवीं आहुतिके हवन किये जानेपर वीर्यभूत आप पुरुषशब्दवाच्य होता है।<br><br>इस क्रमसे उत्पन्न हुआ वह पुरुष जीवित रहता है। कितने काल जीवित रहता है ? सो बतलाया जाता है—'यावज्जीवति'—जबतक इस शरीरमें इसकी स्थितिके निमित्तभूत कर्म रहते हैं, तबतक जीवित रहता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। फिर उनका क्षय होनेपर जब वह मरता है ॥ १३ ॥ |
प्रथम प्रश्नका उत्तर—अन्त्येष्टि संस्काररूप अन्तिम आहुति
अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समिद् धूमो धूमोऽर्चिरर्चिरङ्गारा अङ्गारा विस्फुलिङ्गा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पुरुषं जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषो भास्वरवर्णः संभवति ॥ १४॥
तब इसे अग्निके पास ले जाते हैं। उस (आहुतिभूत पुरुष) का अग्नि ही अग्नि होता है, समिध् समिध् होती है, धूम धूम होता है, ज्वाला ज्वाला होती है, अङ्गारे अङ्गारे होते हैं और विस्फुलिङ्ग विस्फुलिङ्ग होते हैं।