बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1319, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३०३
मापूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ्ङादित्य एति मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्याद् वैद्युतं तान् वैद्युतान् पुरुषो मानस एत्य ब्रह्मलोकान् गमयति ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषां न पुनरावृत्तिः ॥ १५ ॥
वे जो [ गृहस्थ ] इस प्रकार इस [ पञ्चाग्निविद्या ] को जानते हैं तथा जो [ संन्यासी या वानप्रस्थ ] वनमें श्रद्धायुक्त होकर सत्य ( ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भ ) की उपासना करते हैं, वे ज्योतिके अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं, ज्योतिके अभिमानी देवताओंसे दिनके अभिमानी देवताको, दिनके अभिमानी देवतासे शुक्लपक्षाभिमानी देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तरकी ओर रहकर चलता है उन उत्तरायणके छः महीनोंके अभिमानी देवताओंको [ प्राप्त होते हैं, ] षण्मासाभिमानी देवताओंसे देवलोकको, देवलोकसे आदित्यको और आदित्यसे विद्युत्सम्बन्धी देवताओंको प्राप्त होते हैं। उन वैद्युत देवोंके पास एक मानस पुरुष आकर इन्हें ब्रह्मलोकोंमें ले जाता है। वे उन ब्रह्मलोकोंमें अनन्त संवत्सरपर्यन्त रहते हैं! उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती ॥ १५ ॥
| ते, के ? य एवं यथोक्तं पञ्चाग्निदर्शनमेतद् विदुः। एवंशब्दादग्निसमिद्धूमार्चिरङ्गारविस्फुलिङ्गश्रद्धादिविशिष्टाः पञ्चाग्नयो निर्दिष्टाः, तानेवमेतान् पञ्चाग्नीन् विदुरित्यर्थः। <br><br> नन्वग्निहोत्राहुतिदर्शनविषयमेवैतद् दर्शनम्। तत्र ह्युक्तमुत्क्रा- | वे, कौन ? जो इस प्रकार इस पञ्चाग्नि विद्याको जानते हैं। 'एवम्' शब्दसे अग्नि, समिध्, धूम, ज्वाला, अङ्गार, विस्फुलिङ्ग और श्रद्धादिविशिष्ट पाँचों अग्नियोंका निर्देश किया गया है। उन इन पाँच अग्नियोंको जो इस प्रकार जानते हैं-ऐसा इसका तात्पर्य है। <br><br> शङ्का¹-किंतु यह दर्शन तो अग्निहोत्रकी आहुतियोंके दर्शनके विषयमें ही है। वहीं उत्क्रान्ति |
१. 'एवं' शब्द प्रकृत पञ्चाग्नियोंका ही परामर्श करता है—इस बातको स्पष्ट करनेके लिये यह शङ्का उठायी जाती है।