बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1316, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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होमते हैं, उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है। वह जीवित रहता है। जबतक कर्म शेष रहते हैं, वह जीवित रहता है और जब मरता है ॥१३॥
| योषा वा अग्निर्गौतम। योषेति स्त्री पञ्चमो होमाधिकरणोऽग्निस्तस्या उपस्थ एव समित्; तेन हि सा समिध्यते लोमानि धूमस्तदुत्थानसामान्यात्। योनिरर्चिर्वर्णसामान्यात्। यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अन्तःकरणं मैथुनव्यापारः तेऽङ्गारा वीर्योपशमहेतुत्वसामान्यात्-वीर्याद्युपशमकारणं मैथुनम्, तथाङ्गारभावोऽग्नेरुपशमकारणम्। अभिनन्दाः सुखलवाः, क्षुद्रत्वसामान्याद् विस्फुलिङ्गाः। तस्मिन् रेतो जुह्वति, तस्या आहुतेः पुरुषः संभवति। <br><br> एवं द्युपर्जन्यायंलोकपुरुषयोषाग्निषु क्रमेण हूयमानाः श्रद्धासोमवृष्ट्यन्नरेतोभावेन स्थूलतारतम्यक्रममापद्यमानाः श्रद्धाशब्दवाच्या आपः पुरुषशरीरमार- | हे गौतम! योषा ही अग्नि है। योषा अर्थात् स्त्री यह पांचवाँ होमाधिकरणरूप अग्नि है। उपस्थ ही उसका समिध् है। उसीसे वह दीप्त होती है। समिध् से उठनेमें समानता होनेके कारण लोम ही धूम हैं। वर्णमें समानता होनेके कारण योनि ज्वाला है। जो अन्तः (भीतर) करता है, वह अङ्गार है। भीतर करना मैथुनव्यापार अङ्गार है; क्योंकि वीर्यके उपशमके हेतु होनेमें उनकी समानता है। मैथुन वीर्यादिके उपशमका कारण है, इसी प्रकार अङ्गारभाव अग्निके उपशमका कारण है। क्षुद्रत्वमें समानता होनेके कारण अभिनन्द- लेशमात्र सुख विस्फुलिङ्ग हैं। उस (योषाग्नि) में देवगण वीर्य होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है। <br><br> इस प्रकार द्युलोक, मेघ, इहलोक, पुरुष और स्त्रीरूप अग्नियोंमें क्रमसे हवन किये गये श्रद्धा, सोम, वृष्टि, अन्न और वीर्यरूपसे स्थूल तारतम्य क्रमको प्राप्त हुआ श्रद्धाशब्दवाच्य आप् पुरुषशरीरको आरम्भ |