भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1323, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1323

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | १३०७ | | :--- | :--- |

| हुतिक्रमेण पञ्चम्यामाहुतौ हुतायां ततो योषाग्नेर्जाताः पुनर्लोकं प्रत्युत्थायिनोऽग्निहोत्रादिकर्मानुष्ठातारो भवन्ति । तेन कर्मणा धूमादिक्रमेण पुनः पितृलोकं पुनः पर्जन्यादिक्रमेणेममावर्तन्ते । ततः पुनर्योषाग्नेर्जाताः पुनः कर्म कृत्वेत्येवमेव घटीयन्त्रवद् गत्यागतिभ्यां पुनः पुनरावर्तन्ते । | पांचवीं आहुतिके हवन किये जानेपर उससे स्त्रीरूप अग्निमें उत्पन्न होकर फिर लोकमें उत्थान करनेवाले होकर अग्निहोत्रादि कर्मका अनुष्ठान करनेवाले होते हैं । उस कर्मके द्वारा वे धूमादि क्रमसे पुनः पितृलोकमें जाते हैं और पर्जन्यादि क्रमसे पुनः इस लोकमें लौट आते हैं । उससे पुनः स्त्रीरूप अग्निमें उत्पन्न होकर फिर कर्म करके [पितृलोकमें जाते हैं] । इस प्रकार घटीयन्त्र ( रहट ) के सदृश गमनागमनद्वारा बारम्बार जाते-आते रहते हैं । | | यदा त्वेवं विदुस्ततो घटीयन्त्रभ्रमणाद् विनिर्मुक्ताः सन्तोऽर्चिरभिसंभवन्ति । अर्चिरिति नाग्निज्वालामात्रम्, किं तर्हि ? अर्चिरभिमानिन्यर्चिःशब्दवाच्या देवतैवोत्तरमार्गलक्षणा व्यवस्थितैव तामभिसंभवन्ति । न हि परिव्राजकानामग्न्यर्चिषैव साक्षात्सम्बन्धोऽस्ति । तेन देवतैव परिगृह्यतेऽर्चिःशब्दवाच्या । | किंतु जब वे ऐसा जानते हैं, तो इस घटीयन्त्रके समान चक्कर काटनेसे छूटकर अर्चिको प्राप्त होते हैं । यह अर्चि भी अग्निकी ज्वालामात्र नहीं है; तो क्या है ? अर्चिके अभिमानी अर्चिशब्दवाच्य देवता है, जो उत्तरमार्गरूप और स्थिर ही हैं, उन्हें ये प्राप्त होते हैं । परिव्राजकोंका तो अग्निकी अर्चि ( ज्वाला ) से साक्षात् सम्बन्ध भी नहीं है, इसलिये यहाँ अर्चिशब्दवाच्य देवता ही ग्रहण किये जाते हैं । | | अतोऽहर्देवताम्; मरणकालनियमानुपपत्तेरहःशब्दोऽपि देव- | यहाँसे वे अहर्देवता ( दिनाभिमानी देवता ) को प्राप्त होते हैं । मरणकालका कोई नियम नहीं हो सकता, इसलिये अहःशब्दसे भी |