बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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| १३०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तैव । आयुषः क्षये हि मरणम्, न ह्येवंविदाहन्येव मर्तव्यमित्यहर्मरणकालो नियन्तुं शक्यते । न च रात्रौ प्रेताः सन्तोऽहः प्रतीक्षन्ते; "स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छति" ( छा० उ० ८ । ६ । ५) इति श्रुत्यन्तरात् ।<br><br>अह्न आपूर्यमाणपक्षमहर्देवतयातिवाहिता आपूर्यमाणपक्षदेवतां प्रतिपद्यन्ते शुक्लपक्षदेवतामित्येतत् । आपूर्यमाणपक्षाद् यान् षण्मासानुदङ्ङुत्तरां दिशमादित्यः सवितैति तान् मासान् प्रतिपद्यन्ते शुक्लपक्षदेवतयातिवाहिताः सन्तः । मासानिति बहुवचनात् संघचारिण्यः षडुत्तरायणदेवताः । | देवता ही अभिप्रेत हैं [ साक्षात् दिन नहीं ] । आयुके क्षीण होनेपर ही मरण होता है, इस पञ्चाग्नि-उपासकको दिनमें ही मरना चाहिये-इस प्रकार उसके लिये दिनरूप मरणकालका नियम नहीं किया जा सकता । रात्रिमें मरे हुए उपासक [ आगे जानेके लिये ] दिनकी प्रतीक्षा करते हों-ऐसी बात भी नहीं है "जितनी देरमें मन आदित्य-के पास जाता है, उतनी ही देरमें यह आदित्यलोकमें पहुँच जाता है" इस अन्य श्रुतिसे यही सिद्ध होता है ।<br><br>'अह्न आपूर्यमाणपक्षम्'-अहर्देवता-से ऊपर ले जाये जानेपर वे आपूर्य-माणपक्षदेवताको अर्थात् शुक्लपक्ष-देवताको प्राप्त होते हैं । आपूर्यमाण-पक्षदेवतासे जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तर दिशाकी ओर चलता है, उन मासोंको, शुक्लपक्षदेवताद्वारा अपने अधिकारसे बाहर ऊपर पहुँचाये जानेपर, प्राप्त होते हैं ।' 'मासान्' ऐसा बहुवचन होनेके कारण छः उत्तरायण-देवता संघचारी ( मिलकर रहनेवाले ) हैं । |