बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1326, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1326
| १३१० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| Sanskrit | Hindi |
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| इहेत्याकृतिमात्रग्रहणमिति चेच्छ्वोभूते पौर्णमासीमिति यद्वत्। | **पूर्व०—**किंतु 'इह' पदसे तो आकृतिमात्रका ग्रहण होता है अर्थात् केवल इसी संसारका नहीं, सामान्यतः सभी कल्पके संसारका ग्रहण होता है। जैसे 'प्रातःकाल होनेपर पौर्णमास याग करे' इस वाक्यमें सामान्यतः सभी प्रातःकालका ग्रहण होता है। |
| न, इहेतिविशेषणानर्थक्यात्। यदि हि नावर्तन्त एवेहग्रहणमनर्थकमेव स्यात्। श्वोभूते पौर्णमासीमित्यत्र पौर्णमास्याः श्वोभूतत्वमनुक्तं न ज्ञायत इति युक्तं विशेषयितुम्। न हि तत्र श्वआकृतिः शब्दार्थो विद्यत इति श्वःशब्दो निरर्थक एव प्रयुज्यते; यत्र तु विशेषणशब्दे प्रयुक्तेऽन्विष्यमाणे विशेषणफलं चेन्न गम्यते | **सिद्धान्ती—**नहीं; ऐसा माननेसे 'इह' यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा। यदि उनकी कभी पुनरावृत्ति होती ही नहीं, तो 'इह' ( इस कल्पके संसारमें ) यह विशेषण निरर्थक ही होगा।^१ 'प्रातःकाल होनेपर पौर्णमास याग करे' इस वाक्यमें तो 'प्रातःकाल' यह विशेषण यदि शब्दतः कहा न जाय, तो अपने-आप उसका ज्ञान नहीं हो सकता; इसलिये वहाँ विशेषण लगाना उचित ही है। यदि वहाँ भी श्वः ( प्रभात ) का शब्दार्थ सामान्यतः प्रभातकाल मात्र न हो तो 'श्व' शब्दका प्रयोग भी निरर्थक ही समझा जायगा। जहाँ विशेषण शब्दका प्रयोग तो हो, पर खोजनेसे उसका कोई फल न प्रतीत हो, |
१. क्योंकि पुनरावृत्ति संसारमें ही होती है, अतः 'इह' पदका प्रयोग किये बिना भी उसका बोध हो जाता।