बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1332, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1332
| १३१६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मिति। त एवं कर्मिणोऽनुपरिवर्तन्ते घटीयन्त्रवच्चक्रीभूता बंभ्रमतीत्यर्थः—उत्तरमार्गाय सद्योमुक्तये वा यावद् ब्रह्म न विदुः। "इति नु कामयमानः संसरति" इत्युक्तम्। | प्राप्त होते रहते हैं। वे कर्मीलोग इस प्रकार निरन्तर आते-जाते रहते हैं अर्थात् घटीयन्त्रके समान चक्राकार होकर घूमते रहते हैं, जबतक वे ब्रह्मको नहीं जानते तबतक उत्तरमार्ग अथवा सद्योमुक्तिके लिये इसी प्रकार भ्रमते रहते हैं। [ चतुर्थ अध्यायमें ] 'कामना करनेवाला इस प्रकार संसरित होता रहता है' ऐसा कहा भी है। |
| अथ पुनर्य उत्तरं दक्षिणं चैतौ पन्थानौ न विदुरुत्तरस्य दक्षिणस्य वा पथः प्रतिपत्तये ज्ञानं कर्म वा नानुतिष्ठन्तीत्यर्थः। ते किं भवन्ति ? इत्युच्यते—ते कीटाः पतङ्गा यदिदं यच्चेदं दन्दशूकं दंशमशकमित्येतद् भवन्ति। एवं हीयं संसारगतिः कष्टा, अस्यां निमग्नस्य पुनरुद्धार एव दुर्लभः; तथा च श्रुत्यन्तरम् — "तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्व" (छा० उ० ५।१०।८) इति। | और जो उत्तर या दक्षिण—इन दोनों ही मार्गोंको नहीं जानते, अर्थात् उत्तर या दक्षिण मार्गकी प्राप्तिके लिये ज्ञान अथवा कर्मका अनुष्ठान नहीं करते, वे क्या होते हैं, सो कहा जाता है। वे कीट, पतंग और जो ये दन्दशूक अर्थात् डाँस और मच्छर आदि हैं, होते हैं। इस प्रकार यह संसारगति बड़ी कष्टमयी है। इसमें डूबे हुएका पुनः उद्धार होना ही दुर्लभ है। ऐसी ही एक अन्य श्रुति भी है—"वे ये क्षुद्र और निरन्तर आने-जानेवाले जीव होते हैं, जन्म लो और मर जाओ [—ऐसा उनका तीसरा स्थान होता है]।" |
| तस्मात् सर्वोत्साहेन यथाशक्ति स्वाभाविककर्मज्ञानहानेन दक्षिणोत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं शास्त्रीयं कर्म ज्ञानं वानुतिष्ठे- | अतः स्वाभाविक कर्म और ज्ञानको छोड़कर पूर्ण उत्साहके साथ यथाशक्ति दक्षिण और उत्तरमार्गोंकी प्राप्तिके साधनभूत शास्त्रीय कर्म और |