बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1333, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १३१७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| दिति वाक्यार्थः। तथा चोक्तम्— “अतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरम्” (छा० उ० ५। १०। ६) “तस्माज्जुगुप्सेत” (छा० उ० ५। १०। ८) इति श्रुत्यन्तरान्मोक्षाय प्रयतेतेत्यर्थः। अत्राप्युत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधन एव महान् यत्नः कर्तव्य इति गम्यते। एवमेवानुपरिवर्तन्त इत्युक्तत्वात्। | शास्त्रीय ज्ञान (उपासना) का अनुष्ठान करे—ऐसा इस वाक्यका तात्पर्य है। ऐसा ही कहा भी है—“अतः इस व्रीहि-यवादिभावसे छूटना बड़ा कठिन है” “इसलिये इससे बचता रहे” इन दूसरी श्रुतियोंसे तात्पर्य यही है कि मोक्षके लिये प्रयत्न करे। उनमें भी उत्तरमार्गकी प्राप्तिके साधनमें ही महान् यत्न करना चाहिये—ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि [ धूमादि मार्गके विषयमें ] यह कहा गया है कि ‘वे इस प्रकार निरन्तर आते-जाते रहते हैं।’ |
| एवं प्रश्नाः सर्वे निर्णीताः; ‘असौ वै लोकः’ इत्यारभ्य पुरुषः सम्भवति’ इति चतुर्थः प्रश्नः ‘यतिथ्यामाहुत्याम्’ इत्यादिः प्राथम्येन। पञ्चमस्तु द्वितीयत्वेन देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य वेति दक्षिणोत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनकथनेन। तेनैव च प्रथमोऽपि। अग्नेरारभ्य केचिदर्चिः प्रति- | इस प्रकार सब प्रश्नोंका निर्णय हो गया। ‘असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम’ यहाँसे लेकर ‘पुरुषः सम्भवति’ इस स्थलतक ‘यतिथ्यामाहुत्याम्’ इत्यादि चतुर्थ प्रश्नका पहले उत्तर दिया गया है। ‘देवयान-मार्गकी प्राप्तिका साधन तथा पितृयानका साधन क्या है? इस पञ्चम प्रश्नका दक्षिण और उत्तर मार्गकी प्राप्तिके साधन बतलाकर द्वितीय उत्तरद्वारा निर्णय किया है। उसीसे प्रथम प्रश्नका भी उत्तर हो जाता है। [ अन्त्येष्टि-संस्कारके समय ] अग्निमें डाले जानेपर फिर वहाँसे कोई अर्चिरादि मार्गको प्राप्त |
१. पहला प्रश्न था ‘क्या तू जानता है कि यह प्रजा मरकर किस प्रकार विभिन्न मार्गोंको प्राप्त होती है?’ उसका किस प्रकार निर्णय हुआ है—यह इस वाक्यसे बतलाया जाता है।