बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1335, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१९
| मन्थाख्यं कर्मारभ्यते महत्त्व-<br>प्राप्तये; महत्त्वे च सत्यर्थसिद्धं<br>हि वित्तम्; तदुच्यते— | महत्त्वप्राप्तिके लिये मन्थसंज्ञक कर्म<br>आरम्भ किया जाता है। महत्त्व<br>होनेपर तो वित्त स्वतः सिद्ध ही<br>है। इसीसे कहा जाता है— |
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मन्थकर्मकी सामग्री और हवनविधि
स यः कामयेत महत् प्राप्नुयामित्युदगयन आपूर्यमाणपक्षस्य पुण्याहे द्वादशाहमुपसद्व्रती भूत्वौदुम्बरे कँसे चमसे वा सर्वौषधं फलानीति संभृत्य परिसमूह्य परिलिप्याग्निमुपसमाधाय परिस्तीर्यावृताज्यँ सँस्कृत्य पुँसा नक्षत्रेण मन्थँ संनीय जुहोति । यावन्तो देवास्त्वयि जातवेदस्तिर्यञ्चो घ्नन्ति पुरुषस्य कामान् । तेभ्योऽहं भागधेयं जुहोमि ते मा तृप्ताः सर्वैः कामैस्तर्पयन्तु स्वाहा । या तिरश्ची निपद्यतेऽहं विधरणी इति तां त्वा घृतस्य धारया यजे सँराधनीमहँ स्वाहा ॥ १ ॥
जो ऐसा चाहता हो कि मैं महत्त्व प्राप्त करूँ, वह उत्तरायणमें शुक्ल पक्षकी पुण्य तिथिपर बारह दिन उपसद्व्रती ( पयोव्रती ) होकर गूलरकी लकड़ीके कंस ( कटोरे ) या चमसमें सर्वौषध, फल तथा अन्य सामग्रियोंको एकत्रित कर, [ जहाँ हवन करना हो उस स्थानका ] १परिसमूहन एवं २परिलेपन कर अग्नि स्थापन करता है और फिर अग्निके चारों ओर कुशा बिछाकर गृह्यसूत्रोक्त विधिसे घृतका संस्कारकर जिसका नाम पुँल्लिङ्ग हो, उस [ हस्त आदि ] नक्षत्रमें मन्थको [ अपने और अग्निके ]
१. कुशोंसे बुहारना ।
२. गोबर और जलसे वेदीको लीपना ।