भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1336, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1336

१३२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६


बीचमें रखकर हवन करता है। ['यावन्तो' इत्यादि प्रथम मन्त्रका अर्थ—] हे जातवेदः ! तेरे वशवर्ती जितने देवता वक्रमति होकर पुरुषकी कामनाओंका प्रतिबन्ध करते हैं, उनके उद्देश्यसे यह आज्यभाग मैं तुझमें हवन करता हूँ। वे तृप्त होकर मुझे समस्त कामनाओंसे तृप्त करें—स्वाहा¹। ['या तिरश्ची' इत्यादि द्वितीय मन्त्रका अर्थ—] 'मैं सबकी मृत्युको धारण करनेवाला हूँ' ऐसा समझकर जो कुटिलमति देवता तेरा आश्रय करके रहता है, सर्वसाधनोंकी पूर्ति करनेवाले उस देवताके लिये मैं घृतकी धारासे यजन करता हूँ—स्वाहा ॥ १ ॥

स यः कामयेत स यो वित्तार्थी कर्मण्यधिकृतो यः कामयेत; किम् ? महन्महत्त्वं प्राप्नुयां महान् स्यामितीत्यर्थः । तत्र मन्थकर्मणो विधित्सितस्य कालोऽभिधीयते—उदगयनम् आदित्यस्य, तत्र सर्वत्र प्राप्तावापूर्यमाणपक्षस्य शुक्लपक्षस्य; तत्रापि सर्वत्र प्राप्तौ पुण्याहेऽनुकूल आत्मनः कर्मसिद्धिकर इत्यर्थः । द्वादशाहं यस्मिन् पुण्येऽनुकूले कर्म चिकीर्षति ततः प्राक् पुण्याहमेवा-वह जो कामना करे अर्थात् वह जो वित्तार्थी और कर्मका अधिकारी कामना करे; क्या कामना करे ? महत्—महत्त्व प्राप्त करूँ अर्थात् महान् हो जाऊँ—ऐसी कामना करे ।<br><br>अब जिसका विधान करना अभीष्ट है उस मन्थकर्मका काल बतलाया जाता है—आदित्यके उदगयन—उत्तरायणमें होनेपर, उस उत्तरायणमें सर्वत्र प्राप्ति होती है, इसलिये कहते हैं 'आपूर्यमाणपक्षस्य' शुक्लपक्षकी, उसमें भी सर्वत्र प्राप्ति होनेपर कहते हैं—'पुण्याहे'—शुभ अर्थात् अपने कर्मकी सिद्धि करनेवाले दिनपर। 'द्वादशाहम्'—जिस पुण्य अर्थात् अनुकूल दिनपर कर्म करना चाहे उससे पूर्व पुण्यदिवससे ही आरम्भ

१. जहाँ-जहाँ 'स्वाहा' आवे वहाँ आहुति देनी चाहिये।