बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1339, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1339
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२३
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
|---|---|
| फलानि च यथासम्भवं यथाशक्ति च। इतिशब्दः समस्तसम्भारोपचयप्रदर्शनार्थः, अन्यदपि यत् सम्भरणीयं तत् सर्वं सम्भृत्येत्यर्थः। क्रमस्तत्र गृह्योक्तो द्रष्टव्यः। | और यथाशक्ति ग्राम्य फल भी लाकर। मूलमें 'इति' शब्द समस्त सामग्रीका संग्रह प्रदर्शित करनेके लिये है; तात्पर्य यह कि और भी जो संग्रह करने योग्य वस्तु हो, उसका संग्रह करके। इसका क्रम गृह्यसूत्रोंमें देखना चाहिये। |
| परिसमूहनपरिलेपने भूमिसंस्कारः। अग्निमुपसमाधायेति वचनादावसथ्येऽग्नाविति गम्यते; एकवचनादुपसमाधानश्रवणाच्च। विद्यमानस्यैवोपसमाधानम्। परिस्तीर्य दर्भानावृता, स्मार्तत्वात् कर्मणः स्थालीपाकावृत् परिगृह्यते तयाज्यं संस्कृत्य, पुंसा नक्षत्रेण पुंनाम्ना नक्षत्रेण पुण्याहसंयुक्तेन मन्थं सर्वौषधफलपिष्टं तत्रौदुम्बरे चमसे दधनि मधुनि घृते चोपसिच्यैकयोपमन्थन्योपसम्मध्य संनीय मध्ये संस्थाप्यौदुम्बरेण स्रुवेणा- | परिसमूहन और परिलेपन¹—ये भूमिके संस्कार हैं। 'अग्निमुपसमाधाय' अग्निका उपसमाधान--स्थापन कर—इस वचनसे ज्ञात होता है कि गृह्य-अग्निमें होम करे; क्योंकि यहाँ 'अग्निम्' ऐसा एकवचन है और उपसमाधान श्रुत है। विद्यमान अग्निका ही उपसमाधान होता है। दर्भोंको बिछाकर, 'आवृता'—विधिसे, यह कर्म स्मार्त है, इसलिये यहाँ स्थालीपाकरूप विधि गृहीत होती है। उससे घीका संस्कार कर, 'पुंसा नक्षत्रेण'--पुँल्लिङ्ग नामवाले नक्षत्रमें जो पुण्यतिथिसे युक्त हो मन्थको—सम्पूर्ण ओषधियोंके पिष्ट-पिण्डको उस औदुम्बर चमसमें दही, मधु और घृतमें डालकर एक मथानीसे मथकर फिर अपने और अग्निके मध्यमें स्थापित करे। फिर गूलरके स्रुवासे 'यावन्तो |
१. बुहारना और लीपना।