बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1360, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| सा चेदस्मै न दद्यान्मैथुनं कर्तुं काममेनामवक्रीणीयादाभरणादिना ज्ञापयेत्। <br><br> तथापि सा नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेन्मैथुनाय। <br><br> शप्स्यामि त्वां दुर्भगांकरिष्यामीति प्रख्याप्य तामनेन मन्त्रेणोपगच्छेत्—'इन्द्रियेण ते यशसा यश आददे' इति। सा तस्मात्तदभिशापाद् वन्ध्या दुर्भगेति ख्यातायशा एव भवति ॥ ७ ॥ | वह (धर्म) पत्नी यदि इस पतिको मैथुन न करने दे तो वह आभूषण आदिके द्वारा उसपर अपना प्रेम प्रकट करे। <br><br> यदि वैसा करनेपर भी वह मैथुनका अवसर न दे तो पति अपनी इच्छाके अनुसार दण्डका भय दिखाकर उसके साथ बलपूर्वक मैथुनके लिये प्रयत्न करे। <br><br> [ यह भी सम्भव न हो तो ] 'मैं तुझे शाप दे दूँगा, दुर्भगा (वन्ध्या अथवा भाग्यहीना) बना दूँगा।' ऐसा कहकर 'मैं अपने यशोरूप इन्द्रियसे तेरे यशको छीन लेता हूँ' इस मन्त्रका पाठ करते हुए उसके पास जाय। उस अभिशापसे वह 'दुर्भगा' एवं 'वन्ध्या' कही जानेवाली अयशस्विनी ही हो जाती है ॥ ७ ॥ |
सा चेदस्मै दद्यादिन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥ ८ ॥
वह पत्नी यदि उस पतिको मैथुनका अवसर दे तो उसे आशीर्वाद देते हुए कहे—'मैं अपनी यशोरूप इन्द्रियद्वारा तुझमें यशकी ही स्थापना करता हूँ।' तब वे दोनों दम्पति यशस्वी ही होते हैं ॥ ८ ॥
| सा चेदस्मै दद्यादनुगुणैव स्याद् भर्तुस्तदानेन मन्त्रेणोपगच्छेत् 'इन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामि' | वह पत्नी यदि इस पतिको मैथुनका अवसर दे—पतिके सर्वथा अनुकूल ही रहे, तब पति 'मैं यशोरूप इन्द्रियद्वारा तुझमें यशकी ही स्थापना करता हूँ' इस मन्त्रका पाठ करते हुए उसके |
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