भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1362, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1362
१३४६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

अपनी जिस पत्नीके विषयमें ऐसी इच्छा हो कि वह गर्भधारण न करे तो उसकी योनिमें अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके उसके मुखसे अपना मुख मिलाकर अभिप्राणन¹ कर्म करके अपानन क्रिया करे और कहे—'इन्द्रियस्वरूप वीर्यके द्वारा मैं तेरे रेतस्को ग्रहण करता हूँ', ऐसा करनेपर वह रेतोहीन ही हो जाती है—गर्भिणी नहीं होती ॥ १० ॥

| अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीत न धारयेद् गर्भिणी मा भूदिति तस्यामर्थमिति पूर्ववत् ।<br><br>अभिप्राण्याभिप्राणं प्रथमं कृत्वा पश्चादपान्यात्—‘इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे' इत्यनेन मन्त्रेणारेता एव भवति न गर्भिणी भवतीत्यर्थः ॥ १० ॥ | पुरुष अपनी जिस पत्नीके विषयमें ऐसी इच्छा करे कि यह गर्भ धारण न करे—गर्भवती न हो तो वह उसकी योनिमें इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझ लेना चाहिये ।<br><br>अभिप्राण्य—प्रथम अभिप्राणन करके पश्चात् 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे' इस मन्त्रके द्वारा अपानन करे । इससे वह अरेता ही हो जाती है । तात्पर्य यह है कि गर्भवती नहीं होती ॥ १० ॥ |

अथ यामिच्छेद् दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुखँ् संधायापान्याभिप्राण्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥

पुरुषको अपनी जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा हो कि यह गर्भ धारण करे, वह उसकी योनिमें अपनी जननेन्द्रिय स्थापित करके उसके मुखसे मुख मिलाकर पहले अपानन² क्रिया करके पश्चात् अभिप्राणन कर्म करे और कहे—'मैं इन्द्रियरूप वीर्यके द्वारा तेरे रेतस्‌का आधान करता हूँ।' ऐसा करनेसे वह गर्भवती ही होती है ॥ ११ ॥


१. पुरुष अपनी शिश्नेन्द्रियद्वारा स्त्रीकी योनिमें जो वायुको प्रविष्ट करता है, उसे 'अभिप्राणन' कर्म कहते हैं और वह जो अपना शिश्नेन्द्रियको बाहर निकालते हुए उस वायुको भी बाहर निकाल देता है, उस क्रियाको 'अपानन' कहते हैं । २. भावनाद्वारा पहले स्त्रीके रेतसयुक्त वायुका आकर्षण करना यहाँ प्रथम 'अपानन-क्रिया' है । अभिप्राणन कर्म तो पूर्ववत् ही है ।