बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1363, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १३४७
| अथ यामिच्छेद् दधीत गर्भमिति तस्यामर्थमित्यादि पूर्ववत्। पूर्वविपर्ययेणापान्याभिप्राण्यात्— ‘इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामि’ इति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥ | जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा हो कि यह गर्भ धारण करे उसकी योनिमें…इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। पूर्व मन्त्रके विपरीत पहले अपानन क्रिया करके 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामि' इस मन्त्रके द्वारा अभिप्राणन कर्म करे। ऐसा करनेसे वह गर्भवती ही होती है ॥ |
अथ यस्य जायायै जारः स्यात्तं चेद् द्विष्यादामापात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमँ शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रपशूँस्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशापराकाशौ त आददेऽसाविति स वा एष निरिन्द्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रैति यमेवंविद् ब्राह्मणः शपति तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित् परो भवति ॥ १२ ॥
जिस गृहस्थ विद्वान्की पत्नीका किसी जार पुरुषसे सम्बन्ध हो, वह पति उस जारसे द्वेषभाव रखकर उसे दण्ड देना चाहे तो वह मिट्टीके कच्चे बर्तनमें [ पञ्चभूसंस्कारपूर्वक ] अग्नि-स्थापन करके विपरीत क्रमसे अर्थात् दक्षिणाग्र या पश्चिमाग्रभावसे सरकंडोंका बर्हिष बिछाकर उनकी बाणाकार सींकोंको घीसे भिगोकर उनके अग्रभागको विपरीत दिशामें ही रखते हुए उस अग्निमें उनकी चार आहुतियां दे। उन आहुतियोंके मन्त्र