बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1364, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें१३४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ६
इस प्रकार हैं—] 'मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददे※' [ यह मन्त्र पढ़कर 'फट्' शब्दका उच्चारण करके पहली आहुति दे, [ आहुतिके अन्तमें ] 'असौ मम शत्रुः' इस प्रकार बोलकर शत्रु का नाम लेना चाहिये। पूर्ववत् 'मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रपशूंस्त आददे' यह मन्त्र बोलकर दूसरी आहुति दे और अन्तमें 'असौ⋯' कहकर शत्रु का नाम ले। इसी प्रकार 'मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददे' यह मन्त्र बोलकर तीसरी आहुति दे और अन्तमें 'असौ' कहकर शत्रु का नाम ले तथा 'मम समिद्धेऽहौषी-राशापराकाशौ त आददे' यह मन्त्र पढ़कर चौथी आहुति दे और पूर्ववत् 'असौ' कहकर शत्रुके नामका उच्चारण करे। इस प्रकार मन्थ कर्मको जाननेवाला प्राणदर्शी विद्वान् ब्राह्मण जिसको शाप देता है, वह इन्द्रिय-रहित एवं पुण्यहीन होकर इस लोकसे चल बसता है। अतः परस्त्रीगमनके इस भयंकर परिणामको जाननेवाला पुरुष किसी श्रोत्रियकी पत्नीसे समा-गमकी तो बात ही क्या है, परिहासकी भी इच्छा न करे; क्योंकि उक्त अभिचार कर्मको जाननेवाला श्रोत्रिय उसका शत्रु बन जाता है ॥ १२ ॥
| अथ पुनर्यस्य जायायै जार उपपतिः स्यात्तं चेद् द्विष्यादभि-चरिष्याम्येनमिति मन्येत तस्येदं कर्म। आमपात्रेऽग्निमुपसमाधाय सर्वं प्रतिलोमं कुर्यात्तस्मिन्नग्ना- | अब अभिचार कर्म बताते हैं। जिस गृहस्थ विद्वान्की पत्नीका कोई जार उपपति हो, वह पति उस जारसे यदि द्वेष रखता हो तथा इसके प्रति अभिचारका प्रयोग करूँगा, ऐसा निश्चित संकल्प रखता हो तो उसके लिये यह कर्म है। वह मिट्टीके कच्चे बर्तनमें [ पञ्चभूसंस्कारपूर्वक ] अग्नि-स्थापन करके सारी क्रिया विपरीत क्रमसे करे; यथा ईशानसे अग्निकोण- |
※ 'अरे ! यौवन आदिसे प्रकाशित मेरी पत्नीरूप प्रज्वलित अग्निमें तूने वीर्यकी आहुति डाली है, अतः मैं तुझ अपराधीके प्राण और अपानको लिये लेता हूँ।' चारों मन्त्रके अर्थ एक-से हैं। पहलेमें शत्रुके प्राण और अपानको, दूसरेमें पुत्र और पशुओंको, तीसरेमें यज्ञ और पुण्यको तथा चौथेमें प्रार्थना एवं प्रतिज्ञा-पूर्तिकी प्रतीक्षाके अपहरणकी बात कही गयी है।