बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1365, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १३४९
| वेताः शरभृष्टीः शरेषीकाः प्रति- | की ओर दक्षिणाग्र या पश्चिमाग्र भावसे बर्हिषोंका परिस्तरण करे |
|---|---|
| लोमाः सर्पिषाक्ता घृताभ्यक्ता | इत्यादि। उस अग्निमें इन बाणाकार सरकंडोंकी सींकोंका प्रतिलोम (दक्षिणाग्र या पश्चिमाग्र) भावसे |
| जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीरित्याद्या | ही रखते हुए घीमें भिगोकर उनकी आहुति दे। 'मम समिद्धेऽहौषीः' इत्यादि चार आहुतियाँ दे और |
| आहुतीरन्ते सर्वासामसाविति नाम | सबके अन्तमें प्रत्येकके साथ 'असौ' बोलकर शत्रुके नामका |
| ग्रहणं प्रत्येकम्। | उच्चारण करे। |
| स एष एवंविद् यं ब्राह्मणः | वह यह इस प्रकार जाननेवाला ब्राह्मण जिसे शाप देता है, |
| शपति स विसुकृतो विगतपुण्य- | वह विसुकृत-पुण्यकर्मशून्य हो इस लोकसे चल बसता है। अतः |
| कर्मा प्रैति। तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य | परस्त्रीगमनके ऐसे भीषण परिणामको जाननेवाला पुरुष श्रोत्रिय |
| दारेण नोपहासमिच्छेन्मर्मापि न | विद्वान्की पत्नीसे उपहास-परिहासकी भी इच्छा न करे, फिर |
| कुर्यात् किमुताधोपहासं हि यस्मा- | समागमकी तो बात ही क्या है। |
| देवंविदपि तावत् परो भवति शत्रु- | क्योंकि ऐसे अभिचार कर्मको जाननेवाला विद्वान् भी उसका पराया |
| र्भवतीत्यर्थः ॥ १२ ॥ | अर्थात् शत्रु बन जाता है॥ १२ ॥ |
अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत् त्र्यहं कँसे न पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥ १३ ॥
जिसकी पत्नीको ऋतुभाव (रजोधर्म) प्राप्त हो, उसकी वह पत्नी तीन दिनोंतक काँसके बर्तनोंमें न खाय और चौथे दिन स्नानके बाद ऐसा वस्त्र