बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1366, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
|---|
पहने जो फटा न हो, साफ-सुथरा हो। इसे कोई शूद्रजातीय स्त्री या पुरुष न छुए। वह रजस्वला नारी जब तीन दिन बीतनेपर स्नान कर ले तो उसे धान कूटनेके काममें लगावे ॥ १३ ॥
| अथ यस्य जायामार्तवं विन्देदृ- | ‘अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत्’ इत्यादि ग्रन्थको ‘श्रीर्ह वा | | तुभावः प्राप्नुयादित्येवमादिग्रन्थः | एषा स्त्रीणां’ इस मन्त्रभागके पहले समझना चाहिये; क्योंकि अर्थबल- | | श्रीर्ह वा एषा स्त्रीणामित्यतःपूर्व | से ऐसा ही ठीक जान पड़ता है। जिसकी पत्नीको आर्तव—ऋतु- | | द्रष्टव्यः सामर्थ्यात् । त्र्यहं कंसेन | भाव (रजोधर्म) प्राप्त हो, उसकी वह पत्नी तीन दिनोंतक काँसेके | | पिबेदहतवासाश्च स्यात् । नैनां | बर्तनमें न खाय और चौथे दिन स्नान करके ऐसा वस्त्र पहने जो | | स्नातामस्नातां च वृषलो वृषली वा | फटा न हो, साफ-सुथरा हो। स्नानके बाद और पहले भी उस | | नोपहन्यान्नोपस्पृशेत् । | ऋतुमती स्त्रीको कोई शूद्रजातीय स्त्री या पुरुष न छुए। | | त्रिरात्रान्ते त्रिरात्र- | तीन रात बीतनेपर—त्रिरात्र-व्रतकी समाप्ति होनेपर वह आप्ल- | | व्रतसमाप्तावाप्लुत्य स्नात्वा- | वन-स्नान करनेके पश्चात् जो फटा न हो, ऐसा स्वच्छ वस्त्र पहने, इस | | हतवासाः स्यादिति व्यवहितेन | प्रकार व्यवधानयुक्त अहतवासा | | सम्बन्धः । तामाप्लुतां व्रीहीनव- | पदके साथ इस वाक्यका अन्वय है। स्नान करनेके पश्चात् उस स्त्री- | | घातयेद् व्रीह्यवघाताय तामेव | से धान कुटावे। धान कूटनेके | | विनियुञ्ज्यात् ॥ १३ ॥ | कार्यमें उसीको लगावे ॥ १३ ॥ |
स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो जायेत वेदमनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥