बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 160, कुल 1402 में से
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| १५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्यु हैक आहुः ॥ २७ ॥
जो उस इस सामकी प्रतिष्ठाको जानता है वह प्रतिष्ठित होता है। उसकी वाणी ही प्रतिष्ठा है। निश्चय वाणीमें प्रतिष्ठित हुआ ही यह प्राण गाया जाता है। कोई-कोई यह कहते हैं कि ‘वह अन्नमें प्रतिष्ठित होकर गाया जाता है’ ॥ २७ ॥
| तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद। प्रतितिष्ठत्यस्यामिति प्रतिष्ठा वाक्तां प्रतिष्ठां साम्नो गुणं यो वेद स प्रतितिष्ठति ह। “तं यथा यथोपासते” इति श्रुतेस्तद्गुणत्वं युक्तम्। | जो पुरुष उस इस सामकी प्रतिष्ठाको जानता है। जिसमें [साम] प्रतिष्ठित है वह वाक् उसकी प्रतिष्ठा है, उस सामकी गुणभूत प्रतिष्ठाको जो जानता है वह प्रतिष्ठा होता है। “उसे जो जिस प्रकार उपासना करता है [वही हो जाता है]” इस श्रुतिके अनुसार उसका उसी गुणवाला हो जाना उचित ही है। |
| पूर्ववत्फलेन प्रलोभिताय का प्रतिष्ठेति शुश्रूषवे आह—तस्य वै साम्नो वागेव, वागिति जिह्वामूलीयादीनां स्थानानामाख्या, सैव प्रतिष्ठा, तदाह—वाचि हि जिह्वामूलीयादिषु हि यस्मात्प्रति- | फलके द्वारा प्रलोभित हुए तथा ‘वह प्रतिष्ठित क्या है’ यह सुननेकी इच्छावाले पुरुषसे श्रुति पूर्ववत् कहती है—निश्चय उस सामकी वाक् ही, वाक् यह जिह्वामूलीयादि स्थानोंका नाम है, वही प्रतिष्ठा है। यही बात श्रुति कहती है—क्योंकि वाणी अर्थात् जिह्वामूलीयादि स्थानोंमें प्रतिष्ठित हुआ ही यह प्राण |