भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 165

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५९


संस्कृतहिन्दी
तत्र वाक्यार्थमाह—अमृतं मा कुर्वित्येवैतदाहेति ।फलित अर्थ बतलाती है—'मुझे अमर करो' यही कहता है।
तथा तमसो मा ज्योतिर्गमयेति । मृत्युर्वै तमः सर्वमज्ञानमावरणात्मकत्वात्तमः तदेव च मरणहेतुत्वान्मृत्युः। ज्योतिरमृतं पूर्वोक्तविपरीतं दैवं स्वरूपम् । प्रकाशात्मकत्वाज्ज्ञानं ज्योतिः, तदेवामृतमविनाशात्मकत्वात्। तस्मात्तमसो मा ज्योतिर्गमयेति पूर्ववन्मृत्योर्मामृतं गमयेत्यादि । अमृतं मा कुर्वित्येवैतदाह—दैवं प्राजापत्यं फलभावमापादयेत्यर्थः ।तथा 'तमसो मा ज्योतिर्गमय'—इस मन्त्रमें मृत्यु ही तम है; आवरणात्मक होनेके कारण सारा ही अज्ञान तम है और वही मरणका हेतु होनेके कारण मृत्यु है। अमृत ज्योति है; वह पहले बतलाये हुए मृत्युसे विपरीत दैव-देवतासम्बन्धी स्वरूप है। प्रकाशस्वरूप होनेके कारण ज्ञान ही ज्योति है; वही अविनाशात्मक होनेके कारण अमृत है। अतः 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' इसका अर्थ पूर्ववत् 'मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ' इत्यादि है [उक्त वाक्यद्वारा जप करनेवाला] यही कहता है कि मुझे अमर करो अर्थात् मुझे देवता और प्रजापतिसम्बन्धी फल प्राप्त कराओ।
पूर्वो मन्त्रोऽसाधनस्वभावात् साधनभावमापादयेति । द्वितीयस्तु साधनभावादपि अज्ञानरूपात् साध्यभावमापादयेति । मृत्योर्मामृतं गमयेति पूर्वयोरेव मन्त्रयोः समुच्चितोऽर्थस्तृतीयेनइनमें पहला मन्त्र 'मुझे असाधनस्वभावसे साधनस्वभावको प्राप्त करो' ऐसा कहता है। दूसरा मन्त्र 'मुझे अज्ञानरूप साधनभावसे भी साध्य भावको प्राप्त करो' ऐसा कहता है। तथा 'मृत्योर्मामृतं गमय' इस तृतीय मन्त्रद्वारा पहले दोनों मन्त्रोंका ही समुच्चित अर्थ कहा गया है।