बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| त्वाच्च यथापठित एव स्वरः प्रयोक्तव्यो न मान्त्रः। याजमानं जपकर्म। <br><br> एतानि तानि यजूंषि—‘असतो मा सद्गमय’ ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ ‘मृत्योर्मामृतं गमय’ इति। मन्त्राणामर्थस्तिरोहितो भवतीति स्वयमेव व्याचष्टे ब्राह्मणं मन्त्रार्थम्—स मन्त्रो यदाह यदुक्तवान्कोऽसावर्थः? इत्युच्यते— <br><br> ‘असतो मा सद्गमय’ इति मृत्युर्वा असत्—स्वाभाविककर्मविज्ञाने मृत्युरित्युच्येते, असद् अत्यन्ताधोभावहेतुत्वात्। सदमृतम्—सच्छास्त्रीयकर्मविज्ञाने-ऽमरणहेतुत्वादमृतम्। तस्मादसतो असत्कर्मणोऽज्ञानाच्च मा मां सच्छास्त्रीयकर्मविज्ञाने गमय देवभावसाधनात्मभावमापादयेत्यर्थः। | ब्राह्मणभागजनित होनेके कारण इनमें इनके पाठके अनुसार ही स्वरका प्रयोग करना चाहिये, मान्त्रस्वरका नहीं १। यह जपकर्म यजमानका है। <br><br> वे यजुर्मन्त्र ये हैं—‘असतो मा सद्गमय’, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, ‘मृत्योर्मामृतं गमय’। मन्त्रोंका अर्थ गूढ़ होता है, इसलिये ब्राह्मण स्वयं ही इन मन्त्रोंके अर्थकी व्याख्या करता है। जिसे वह मन्त्र कहता है, वह अर्थ क्या है ? सो बतलाया जाता है—‘असतो मा सद्गमय’ इस मन्त्रमें मृत्यु ही असत् है, स्वाभाविक कर्म और विज्ञानको मृत्यु कहते हैं। वह अत्यन्त अधोगतिका हेतु होनेके कारण असत् है। सत् अमृत है, सत् शास्त्रीय कर्म और विज्ञानका नाम है, वह अमरताका हेतु होनेके कारण अमृत है। अतः असत्—असत्कर्म अर्थात् अज्ञानसे मुझे सत्—शास्त्रीय कर्म और विज्ञानको प्राप्त कराओ। अर्थात् देवभावके साधनभूत आत्मभावकी प्राप्ति कराओ। यहाँ श्रुति वाक्यका |
१. जहाँ मान्त्रस्वर विवक्षित होता है वह तृतीयासे निर्देश किया जाता है; जैसे—"उच्चैर्ऋचा क्रियते" "उच्चैःसाम्ना" "उपांशु यजुषा" इत्यादि वाक्योंमें कहा गया है। परंतु यहाँ 'एतानि' ऐसा द्वितीया विभक्तिका निर्देश है। इसलिये इस सनमें जपकर्मकी ही प्रतीति होती है, मान्त्रस्वरकी प्रतीति नहीं होती।