बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 163, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 163
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १५७ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| अथानन्तरं यस्माच्चैवं विदुषा प्रयुज्यमानं देवभावायाभ्यारोहफलं जपकर्म, अतस्तस्माद्विधीयत इह। तस्य चोद्गीथसम्बन्धात्सर्वत्र प्राप्तौ पवमानानामिति वचनात् पवमानेषु त्रिष्वपि कर्तव्यतायां प्राप्तायां पुनः कालसंकोचं करोति—स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति। स प्रस्तोता यत्र यस्मिन्काले साम प्रस्तुयात्प्रारभेत तस्मिन्काल एतानि जपेत्। | इसके पश्चात्, क्योंकि इस प्रकार जाननेवाले उपासकके द्वारा प्रयोग किया हुआ अभ्यारोहफलवाला जपकर्म देवभावकी प्राप्ति करानेवाला है, इसलिये यहाँ उसका विधान किया जाता है। उद्गीथसे सम्बन्ध होनेके कारण उसकी सर्वत्र प्राप्ति होनेपर 'पवमानानाम्' (पवमानोंके) इस वचनसे तीन पवमानोंमें ही उसकी प्राप्ति होती है—ऐसा प्राप्त होनेपर 'स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति' इस वाक्यसे श्रुति उसका पुनः कालसंकोच करती है। अर्थात् जिस समय वह प्रस्तोता सामका प्रस्ताव—प्रारम्भ करे उस कालमें इनका जप करे। |
| अस्य च जपकर्मण आख्या अभ्यारोह इति। आभिमुख्येनारोहत्यनेन जपकर्मणैवंविद् देवभावात्मानमित्यभ्यारोहः। एतानीति बहुवचनात्त्रीणि यजूंषि। द्वितीयानिर्देशाद् ब्राह्मणोत्पन्न- | इस जपकर्मका 'अभ्यारोह' यह नाम है। इस जपकर्मके द्वारा इस प्रकार प्राणकी उपासना करनेवाला पुरुष अभिमुखतासे अपने देवभावको आरूढ—प्राप्त हो जाता है, इसलिये यह अभ्यारोह है। 'एतानि' यह बहुवचनान्त होनेके कारण ये तीन यजुर्मन्त्र हैं तथा 'एतानि' शब्दमें द्वितीयानिर्देश और इन मन्त्रोंके |