बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तस्मादहंनामाभवत् । तस्योपनिषदहमिति श्रुतिप्रदर्शितमेव नाम वक्ष्यति । | कहा था, इसलिये वह अहंनामवाला हुआ। उसका श्रुतिप्रदर्शित ही 'अहम्' यह नाम उपनिषद् आगे बतावेगी। | | तस्माद्यस्मात्कारणे प्रजापतावेवं वृत्तं तस्मात्, तत्कार्यभूतेषु प्राणिषु एतर्ह्येतस्मिन्नपि काले आमन्त्रितः कस्त्वमित्युक्तः सन्नहमयमित्येवाग्र उक्त्वा कारणात्माभिधानेन आत्मानमभिधायाग्रे पुनर्विशेषनामजिज्ञासवेऽथानन्तरं विशेषपिण्डाभिधानं देवदत्तो यज्ञदत्तो वेति प्रब्रूते कथयति यन्नामास्य विशेषपिण्डस्य मातापितृकृतं भवति तत्कथयति । | इसीसे, क्योंकि कारणरूप प्रजापतिमें यह वृत्तान्त घटित हुआ इसीलिये एतर्हि—इस समय भी उसके कार्यभूत जीवोंमें जब किसीको 'तू कौन है' ऐसा कहकर पुकारा जाता है तो पहले 'यह मैं हूँ' इस प्रकार अपनेको कारणरूप नामसे बतलाकर फिर जो विशेष नामको जानना चाहता है उसे अपने विशेष शरीरका 'देवदत्त' या 'यज्ञदत्त' ऐसा कोई नाम बतलाता है अर्थात् जो नाम इसके विशेष पिण्डके माता-पिताका रखा हुआ होता है, उसे बतलाता है। | | स च प्रजापतिरतिक्रान्तजन्मनि सम्यक्कर्मज्ञानभावनानुष्ठानैः साधकावस्थायां यद्यस्मात्कर्मज्ञानभावनानुष्ठानैः प्रजापतित्वं प्रतिपित्सूनां पूर्वः प्रथमः सन् अस्मात्प्रजापतित्वप्रतिपित्सुसमुदायात्सर्वस्माद् आदौ औषद्- | उस प्रजापतिने अपने पूर्वजन्ममें साधकावस्थामें सम्यक् कर्म और ज्ञानकी भावनाके अनुष्ठानोंद्वारा, इस कर्म और ज्ञानकी भावनाके अनुष्ठानोंसे प्रजापतित्वकी प्राप्तिकी इच्छावालोंसे पूर्ववर्ती अर्थात् पहला होनेके कारण, इस प्रजापतित्वप्राप्तिकी इच्छावाले सम्पूर्ण समुदायसे पूर्व |