भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 173

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १६७


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-भाष्यार्थ
दहत् ! किम् ? आसङ्गाज्ञानलक्षणान्सर्वान्पाप्मनः प्रजापतित्वप्रतिबन्धकारणभूतान् । यस्मादेवं तस्मात्पुरुषः, पूर्वमौषदिति पुरुषः ।उषन—दग्ध कर दिया था; किसे?—प्रजापतित्वके प्रतिबन्धक कारणरूप अभिनिवेश और अज्ञानादि सम्पूर्ण पापोंको। क्योंकि ऐसा हुआ, इसलिये यह 'पुरुष' हुआ। पूर्वमें ओषण किया, इसलिये 'पुरुष' कहलाया।
यथायं प्रजापतिरोषित्वा प्रतिबन्धकान्पाप्मनः सर्वान्पुरुषः प्रजापतिरभवत्, एवमन्योऽपि ज्ञानकर्मभावनानुष्ठानवह्निना केवलं ज्ञानबलाद्वौषति भस्मीकरोति ह वै स तम्; कम् ? योऽस्माद्विदुषः पूर्वः प्रथमः प्रजापतिर्बुभूषति भवितुमिच्छति तमित्यर्थः । तं दर्शयति य एवं वेदेति । सामर्थ्याज्ज्ञानभावनाप्रकर्षवान् ।जिस प्रकार यह प्रजापति सम्पूर्ण प्रतिबन्धक पापोंका ओषण करके पुरुषरूप प्रजापति हुआ उसी प्रकार दूसरा भी ज्ञान और कर्मकी भावनाके अनुष्ठानरूप अग्निसे अथवा केवल ज्ञानबलसे उसका ओषण करता है—उसे भस्म कर देता है, किसे ? जो इस विद्वान्से पहले प्रजापति होना चाहता है उसको—ऐसा इसका तात्पर्य है। उस (विद्वान्) को श्रुति दिखलाती है—जो इस प्रकार जानता (उपासना करता) है। उसकी सामर्थ्यसे जाना जाता है कि वह ज्ञानभावनामें बढ़ा-चढ़ा होता है।
नन्वनर्थाय प्राजापत्यप्रतिपित्सा, एवंविदा चेद्दह्यते ।शङ्का—यदि वह इस प्रकार उपासना करनेवालेसे दग्ध करदिया जाता है तब तो प्रजापतित्वप्राप्तिकी इच्छा अनर्थकी ही हेतु है।
नैष दोषः, ज्ञानभावनोत्कर्षाभावात्प्रथमं प्रजापतित्वप्रतिपत्त्यभावमात्रत्वाद्दाहस्य । उत्कृष्ट-समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि ज्ञानभावनाके उत्कर्षका अभाव होनेके कारण पहले प्रजापतित्व प्राप्त न कर सकना ही उसका