बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 174, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| साधनः प्रथमं प्रजापतित्वं प्राप्नुवन् न्यूनसाधनो न प्राप्नोतीति, स तं दहतीत्युच्यते । न पुनः प्रत्यक्षमुत्कृष्टसाधनेन इतरो दह्यते । यथा लोके आजिसृतां यः प्रथममाजिमुपसर्पति तेनेतरे दग्धा इवापहृतसामर्थ्या भवन्ति तद्वत् ॥ १ ॥ | दाह है। तात्पर्य यह है कि जो उत्कृष्ट साधनवाला होता है वह पहले प्रजापतित्व प्राप्त करता है और न्यून साधनवाला प्राप्त नहीं करता; अतः वह उसे भस्म कर देता है—ऐसा कहा गया है। उत्कृष्ट साधनवाला अपनेसे भिन्न—न्यून साधनवालेको साक्षात् जला ही डालता हो—ऐसी बात नहीं है। जिस प्रकार लोकमें किसी मर्यादातक दौड़कर जानेवालोंमें जो पहले मर्यादापर पहुँचता है उसके द्वारा दूसरे लोग दग्ध-से होकर अपहृतसामर्थ्य—हतोत्साह हो जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये ॥ १ ॥ |
प्रजापतिका भय और विचारद्वारा उसकी निवृत्ति
| यदिदं तुष्टूषितं कर्मकाण्डविहितज्ञानकर्मफलं प्राजापत्यलक्षणं नैव तत्संसारविषयमत्यक्रामदितीयमर्थं प्रदर्शयिष्यन्नाह— | यहाँ जिस प्रजापतित्वरूप कर्मकाण्डविहित ज्ञान और कर्मके फलकी स्तुति करनी अभीष्ट है वह सांसारिक विषयसे बाहर नहीं है—इस बातको दिखानेके लिये श्रुति कहती है— |
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सोऽबिभेत्तस्मादेकाकी बिभेति स हायमीक्षां चक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्ध्यभेष्यद् द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥२॥
वह भयभीत हो गया। इसीसे अकेला पुरुष भय मानता है। उसने यह विचार किया 'यदि मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं है तो मैं किससे डरता