बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 175, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६९
हूँ?' तभी उसका भय निवृत्त हो गया। किंतु उसे भय क्यों हुआ ? क्योंकि भय तो दूसरेसे ही होता है ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सोऽबिभेत्स प्रजापतिर्योऽयं प्रथमः शरीरी पुरुषविधो व्याख्यातः । सोऽबिभेद्भीतवानस्मदादिवदेवेत्याह । यस्मादयं पुरुषविधः शरीरकरणवान् आत्मनाशविपरीतदर्शनवत्त्वाद् अबिभेत्, तस्मात्तत्सामान्यादद्यत्वेऽप्येकाकी बिभेति । किञ्चास्मदादिवदेव भयहेतुविपरीतदर्शनापनोदकारणं यथाभूतात्मदर्शनम् । सोऽयं प्रजापतीरीक्षामीक्षणं चक्रे कृतवान्ह । कथम् ? इत्याह — यद्यस्मान्मत्तोऽन्यदात्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरं प्रतिद्वन्द्वीभूतं नास्ति, तस्मिन्नात्मविनाशहेत्वभावे कस्मान्नु बिभेमीति । तत एव यथाभूतात्मदर्शनादस्य प्रजापतेर्भयं वीयाय विस्पष्टमपगतवत् । | वह भयभीत हो गया । अर्थात् वह प्रजापति, जिसकी पुरुषाकार प्रथम शरीरके रूपमें व्याख्या की गयी है, हमारे समान ही भयभीत हो गया—ऐसा श्रुति कहती है । क्योंकि यह पुरुषविध शरीरेन्द्रियवान् प्रजापति आत्मनाशरूप विपरीत ज्ञानवाला होनेके कारण डर गया था, इसलिये उससे समानता होनेके कारण आज भी अकेला होनेपर पुरुष डरता है । इसके सिवा हमारे समान ही प्रजापतिके भी भयके हेतुभूत विपरीत ज्ञानकी निवृत्तिका कारण यथार्थ आत्मज्ञान ही हुआ । उस इस प्रजापतिने ईक्षा—ईक्षण (विचार) किया । किस प्रकार विचार किया ? सो श्रुति बतलाती है—यदि इस मेरेसे भिन्न अर्थात् आत्माके सिवा इसका प्रतिद्वन्द्वी कोई और पदार्थ नहीं है, तो उस आत्मनाशके कारणके अभावमें मैं किससे डरता हूँ ? उसीसे यानी उस यथार्थ आत्मदर्शनसे ही इस प्रजापतिका भय विगत—विस्पष्टतया निवृत्त हो गया । |