भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 176
१७०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| तस्य प्रजापतेर्यद्भयं तत्केवलाविद्यानिमित्तमेव परमार्थदर्शनेऽनुपपन्नमित्याह—कस्माद्ध्यभेष्यत किमित्यसौ भीतवान्परमार्थनिरूपणायां भयमनुपपन्नमेवेत्यभिप्रायः। यस्माद् द्वितीयाद्वस्त्वन्तराद्वै भयं भवति। द्वितीयं च वस्त्वन्तरमविद्याप्रत्युपस्थापितमेव; न ह्यदृश्यमानं द्वितीयं भयजन्मनो हेतुः “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ईशा० ७) इति मन्त्रवर्णात्। यच्चैकत्वदर्शनेन भयमपनुनोद तद्युक्तम्। कस्मात्? द्वितीयाद्वस्त्वन्तराद्वै भयं भवति, तदेकत्वदर्शनेन द्वितीयदर्शनमपनीतमिति नास्ति यतः। | उस प्रजापतिको जो भय था वह केवल अविद्याके ही कारण था, परमार्थज्ञान होनेपर उसका होना असम्भव था, यही बात श्रुति कहती है—'वह क्यों डरा?'—इसका क्या कारण है कि उसे भय हुआ ? तात्पर्य यह है कि परमार्थतः विचार किया जाय तो उसे भय होना अयुक्त ही है; क्योंकि भय तो दूसरे-से ही होता है। और [ आत्मासे भिन्न ] दूसरी वस्तु तो अविद्या-द्वारा प्रस्तुत की हुई ही है; क्योंकि न दीखनेवाली कोई दूसरी वस्तु भयकी उत्पत्तिका कारण नहीं हो सकती; जैसा कि "उस अवस्थामें निरन्तर एकत्वदर्शन करनेवाले पुरुषको क्या मोह और क्या शोक हो सकता है?” इस मन्त्रसे सिद्ध होता है।¹ प्रजापतिने जो एकत्व-दर्शनके द्वारा अपने भयको निवृत्त किया सो उचित ही है। क्यों उचित है? क्योंकि द्वितीय यानी अन्य वस्तुसे ही भय होता है। वह द्वितीयदर्शन आत्माके एकत्वदर्शन-से निवृत्त हो गया; क्योंकि वास्तव-में द्वितीय है नहीं। |


१. यदि कोई कहे कि प्रजापतिका भय विराट् पुरुषके साथ एकत्वज्ञानसे ही निवृत्त हुआ था, अद्वैतदृष्टिके कारण नहीं—तो इसका उत्तर श्रुति आगेके वाक्यसे देती है।

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