बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 177, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अत्र चोदयन्ति—कुतः प्रजापतेरेकत्वदर्शनं जातम् ? को वास्मै उपदिदेश ? अथानुपदिष्टमेव प्रादुरभूत्, अस्मदादेरपि तथा प्रसङ्गः । अथ जन्मान्तरकृतसंस्कारहेतुकम्, एकत्वदर्शनानर्थक्यप्रसङ्गः । यथा प्रजापतेरतिक्रान्तजन्मावस्थस्य एकत्वदर्शनं विद्यमानमप्यविद्याबन्धकारणं नापनिन्थे, यतः अविद्यासंयुक्त एवायं जातोऽबिभेत्, एवं सर्वेषामेकत्वदर्शनानर्थक्यं प्राप्नोति । अन्त्यमेव निवर्तकमिति चेन्न, पूर्ववत्पुनः प्रसङ्गेनानैकान्त्यात् । तस्मादनर्थकमेवैकत्वदर्शनमिति । | यहाँ यह शङ्का करते हैं कि प्रजापतिको किससे एकत्वज्ञान हुआ ? उसे किसने उपदेश किया था ? अथवा बिना उपदेशके ही उसका प्रादुर्भाव हो गया, तब तो हमारे लिये भी वैसा ही प्रसङ्ग हो सकता है। यदि उसे जन्मान्तरकृत संस्कारसे होनेवाला माना जाय तो एकत्वदर्शनकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होता है। अर्थात् जिस प्रकार अपने पूर्वजन्ममें स्थित प्रजापतिके एकत्वदर्शनने विद्यमान रहनेपर भी अविद्यारूप बन्धनके कारणकी निवृत्ति नहीं की—क्योंकि अविद्यासंयुक्त उत्पन्न होनेके कारण ही उसे भय हुआ था—इसी प्रकार सभीके एकत्वदर्शनकी व्यर्थता प्राप्त होती है। यदि कहो कि सबके अन्तमें होनेवाला एकत्वज्ञान ही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाला होता है तो यह ठीक नहीं, क्योंकि पूर्ववत् पुनः प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर उसका अव्यभिचारित्व नहीं रह सकेगा अतः एकत्वदर्शन व्यर्थ ही है। |
| नैष दोषः, उत्कृष्टहेतूद्भवत्वाल्लोकवत् । यथा पुण्यकर्मो- | समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि व्यवहारमें अन्य लोगोंके समान प्रजापतिका जन्म उत्कृष्ट हेतुसे हुआ है। जिस प्रकार पुण्य- |