भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 178
१७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| द्भवैर्विविक्तैः कार्यकारणैः संयुक्ते जन्मनि सति प्रज्ञामेधास्मृतिवैशारद्यं दृष्टम्, तथा प्रजापतेः धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यविपरीतहेतुसर्वपाप्मदाहात् विशुद्धैः कार्यकारणैः संयुक्तमुत्कृष्टं जन्म, तदुद्भवं चानुपदिष्टमेव युक्तमेकत्वदर्शनं प्रजापतेः। तथा च स्मृतिः—"ज्ञानमप्रतिघं यस्य वैराग्यं च जगतपतेः। ऐश्वर्यं चैव धर्मश्च सहसिद्धं चतुष्टयम्॥" इति। | कर्मोंसे प्राप्त हुए पवित्र देह और इन्द्रियोंसे युक्त जन्म होनेपर बुद्धि, मेधाशक्ति और स्मृतिकी विशदता देखी जाती है उसी प्रकार धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यके विपरीत अधर्मादिके कारण होनेवाले समस्त पापोंका दाह हो जानेसे प्रजापतिका विशुद्ध देह और इन्द्रियोंसे युक्त उत्कृष्ट जन्म है, उससे होनेवाला प्रजापतिका एकत्वदर्शन भी बिना उपदेश किया हुआ ही है ऐसा मानना युक्तिसङ्गत ही है। ऐसा ही यह स्मृति भी कहती है—"जिस जगत्पतिका निरंकुश ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य और धर्म—ये चारों सहसिद्ध (जन्मसिद्ध) हैं" इत्यादि। | | सहसिद्धत्वे भयानुपपत्तिरिति चेत्। न ह्यादित्येन सह तम उदेति। | शङ्का— किंतु इनके सहसिद्ध होनेपर उसे भय होना अनुपपन्न है, सूर्यके साथ अन्धकारका उदय नहीं हो सकता। | | न, अन्यानुपदिष्टार्थत्वात्सहसिद्धवाक्यस्य। | समाधान— ऐसा मत कहो; क्योंकि इस सहसिद्धवाक्यका तात्पर्य उसके ज्ञानको इसके द्वारा अनुपदिष्ट बतलानेमें है। | | श्रद्धातात्पर्यप्रणिपातादीनामहेतुत्वमिति चेत् स्यान्मतम् 'श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः | शङ्का— यदि ऐसा माना जायगा तो श्रद्धा, तत्परता एवं प्रणिपातादिकी ज्ञानोत्पत्तिमें अहेतुता प्राप्त होगी। अर्थात्—यदि प्रजापतिके समान |