भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७३


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
संयतेन्द्रियः” (गीता ४।३९) “तद्विद्धि प्रणिपातेन” (गीता ४।३४) इत्येवमादीनां श्रुतिस्मृतिविहितानां ज्ञानहेतूनामहेतुत्वम्, प्रजापतिरिव जन्मान्तरकृतधर्महेतुत्वे ज्ञानस्येति चेत् ?जन्मान्तरकृत धर्म ही ज्ञानका हेतु होगा तो “जितेन्द्रिय एवं तत्पर श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानलाभ करता है” “उस ज्ञानको प्रणिपात करके जानो” इत्यादि प्रकारके श्रुति-स्मृतिवाक्योंद्वारा विहित ज्ञानके हेतुओंकी अहेतुता प्राप्त होगी।
न; निमित्तविकल्पसमुच्चयगुणवदगुणवत्त्वभेदोपपत्तेः। लोके हि नैमित्तिकानां कार्याणां निमित्तभेदोऽनेकधा विकल्प्यते। तथा निमित्तसमुच्चयः। तेषां च विकल्पितानां समुच्चितानां पुनर्गुणवदगुणवत्त्वकृतो भेदो भवति। तद्यथा-रूपज्ञान एव तावन्नैमित्तिके कार्ये-तमसि विनालोकेन चक्षूरूपसन्निकर्षो नक्तञ्चराणां रूपज्ञाने निमित्तं भवति। मन एव केवलं रूपज्ञाननिमित्तं योगिनाम्। अस्माकं तु सन्निकर्षालोकाभ्यां सह तथादित्यचन्द्राद्यालोकभेदैः समुच्चिता निमित्तभेदा भवन्ति।समाधान—ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि निमित्तोंके विकल्प, समुच्चय, गुणवत्त्व, अगुणवत्त्व—ऐसे भेद हो सकते हैं। लोकमें निमित्तसे होनेवाले कार्योंके निमित्तका भेद अनेक प्रकारसे विकल्पित किया जाता है। इसी प्रकार निमित्तका समुच्चय भी अनेक प्रकारसे होता है। उन विकल्पित और समुच्चित हेतुओंका भी गुणवत्त्व और अगुणवत्त्वके कारण भेद होता है। सो इस प्रकार है—पहले नैमित्तिक कार्यभूत रूपज्ञानमें ही [ निमित्त-भेद यों है— ] निशाचरोंको बिना प्रकाशके अन्धकारमें ही होनेवाला नेत्र और रूपका संनिकर्ष रूपज्ञानमें कारण होता है, योगियोंका मन ही रूपज्ञानमें हेतु है तथा हमें चक्षुःसंनिकर्ष और प्रकाश दोनोंके होनेपर रूपज्ञान होता है। इसी प्रकार सूर्य और चन्द्र आदि प्रकाशोंके भेदसे भिन्न-भिन्न