भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 270
२६४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| वावेत्' इत्युक्तम्, नात्मनो विषयीकरणम् । | किया गया है, आत्माको विषय करना नहीं बताया गया। | | तत्कथमवेत् ? इत्याह—अहं दृष्टेर्द्रष्टा आत्मा ब्रह्मास्मि भवामीति | उस ब्रह्मने किस प्रकार जाना ? सो श्रुति बतलाती है, मैं दृष्टिका द्रष्टा आत्मा ब्रह्म हूँ—ऐसा जाना । | | ब्रह्मेति-यत्साक्षादपरोक्षात्सर्वान्तर आत्मा अशनायाद्यतीतो नेति नेत्यस्थूलमण्वित्येवमादिलक्षणम्, तदेवाहर्मास्म, नान्यः संसारी, यथा भवानाहेति । | ब्रह्म अर्थात् जो साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर आत्मा, क्षुधादि विकारोंसे रहित, 'नेति-नेति' वाक्यप्रतिपादित, अस्थूल, असूक्ष्म इत्यादि प्रकारके लक्षणोंवाला है, वही मैं हूँ; जैसा कि आप कहते हैं मैं अन्य यानी संसारी नहीं हूँ । अतः इस प्रकार- | | तस्मादेवं विज्ञानात्तद्ब्रह्म सर्वमभवत्—अब्रह्माध्यारोपापगमात् तत्कार्यस्यासर्वत्वस्य निवृत्त्या सर्वमभवत् । तस्माद्युक्तमेव मनुष्या मन्यन्ते यद्ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्याम इति । | के विज्ञानसे वह ब्रह्म सर्वरूप हो गया । अर्थात् अब्रह्मरूप अध्यारोपके बाधसे उसके कार्यभूत असर्वत्वकी निवृत्ति हो जानेसे वह सर्वरूप हो गया । अतः मनुष्य जो ऐसा मानते हैं कि ब्रह्मविद्याके द्वारा हम सर्वरूप हो जायेंगे, वह उचित ही है । | | यत्पृष्टम्, 'किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मात्तत्सर्वमभवत्' इति, तन्निर्णीतम्—'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्' इति । | [ इस प्रकार ] यह जो पूछा गया था कि 'उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्व हो गया' उसका 'पहले यह ब्रह्म ही था; उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ, अतः वह सर्व हो गया' इस वाक्यसे निर्णय कर दिया गया । |