भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 272

२६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १

प्रतिपेदे ह प्रतिपन्नवान्किल। स एतस्मिन्ब्रह्मात्मदर्शनेऽवस्थित एतान्मन्त्रान्ददर्श—'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादीन्। 'तदेतद्ब्रह्म पश्यन्' इति ब्रह्मविद्या परामृश्यते। 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादिना सर्वभावापत्तिं ब्रह्मविद्याफलं परामृशति। पश्यन्सर्वात्मभावं फलं प्रतिपेद इत्यस्मात्प्रयोगाद् ब्रह्मविद्यासहायसाधनसाध्यं मोक्षं दर्शयति; भुञ्जानस्तृप्यतीति यद्वत्।ब्रह्मके दर्शनसे ही यह प्रतिपत्ति हुई—यह ज्ञान हुआ। इस ब्रह्मात्मदर्शनमें स्थित होकर उसने इन 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादि मन्त्रोंका साक्षात्कार किया।<br>'तदेतद्ब्रह्म पश्यन्' इस वाक्यसे श्रुति ब्रह्मविद्याका परामर्श करती है तथा 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादि वाक्यसे ब्रह्मविद्याके फल सर्वभावकी प्राप्तिका परामर्श करती है। ब्रह्मको देखनेवाले वामदेव ऋषि सर्वात्मभावरूप फलको प्राप्त हुए—इस प्रयोगसे वह मोक्षको ब्रह्मविद्याके सहायभूत साधनोंसे साध्य दिखलाती है, जैसे कि भोजन करनेवाला तृप्त होता है।^३
सेयं ब्रह्मविद्यया सर्वभावापत्तिरासीन्महतां देवादीनां वीर्यातिशयात्। नेदानीमैंदंयुगीनानां विशेषतो मनुष्याणाम्, अल्पवीर्यत्वादिति स्यात्कस्यचिद्बुद्धिः, तदुत्थापनायाह—ब्रह्मविद्याके द्वारा वह यह सर्वभावकी प्राप्ति देवादि महापुरुषोंको उनमें विशेष सामर्थ्य होनेके कारण हो गयी थी। अब वर्तमान युगके प्राणियोंको और उनमें भी अल्पवीर्य होनेके कारण मनुष्योंको उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती—ऐसा यदि किसीका विचार हो तो उसे निवृत्त करनेके लिये श्रुति कहती है—

१. मैं मनु हुआ और सूर्य भी। २. उस इस ब्रह्मको देखते हुए। ३. इस वाक्यमें जैसे भोजन-क्रिया तृप्तिका साधन प्रतीत होती है, उसी प्रकार मुक्तिका साधन ब्रह्मविद्या है।