बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 273, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६७
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| तदिदं प्रकृतं ब्रह्म यत्सर्वभूतानुप्रविष्टं दृष्टिक्रियादिलिङ्गम्, एतर्हि तस्मिन्नपि वर्तमानकाले यः कश्चिद्व्यावृत्तबाह्यौत्सुक्य आत्मानमेवैवं वेद 'अहं ब्रह्मास्मि' इति—अपोह्योपाधिजनितभ्रान्तिविज्ञानाध्यारोपितान्विशेषान् संसारधर्मानागन्धितमनन्तरमबाह्यं ब्रह्मैवाहमस्मि केवलमिति—सोऽविद्याकृतासर्वत्वनिवृत्तेर्ब्रह्मविज्ञानादिदं सर्वं भवति । न हि महावीर्येषु वामदेवादिषु हीनवीर्येषु वा वार्तमानिकेषु मनुष्येषु ब्रह्मणो विशेषस्तद्विज्ञानस्य वास्ति । | उस इस प्रकृत ब्रह्मको, जो समस्त भूतोंमें अनुप्रविष्ट है तथा दृष्टि-क्रियादि जिसके लिङ्ग हैं, इस समय अर्थात् इस वर्तमानकालमें भी जो कोई बाह्य विषयोंकी अभिलाषासे मुक्त होकर आत्माको ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार जानता है अर्थात् उपाधिजनित मिथ्या ज्ञानसे आरोपित विशेषोंका बाध कर जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं जिसमें संसारधर्मोंकी गंध भी नहीं है ऐसा अन्तर-बाह्यशून्य शुद्ध ब्रह्म ही हूँ, वह अविद्याकृत असर्वत्वकी निवृत्ति हो जानेसे ब्रह्मज्ञानके द्वारा यह सर्व हो जाता है । महान् प्रभावशाली वामदेवादि अथवा मन्दवीर्य आधुनिक पुरुषोंमें ब्रह्म अथवा उसके विज्ञानका कोई अन्तर नहीं है। |
| वार्तमानिकेषु पुरुषेषु तु ब्रह्मविद्याफले अनैकान्तिकता शङ्क्यत (ब्रह्मविद्या-माहात्म्यम्) इत्यत आह—तस्य ह ब्रह्मविज्ञातुर्यथोक्तेन विधिना देवा महावीर्याश्च नापि अभूत्य-अभवनाय ब्रह्मस्वभावस्य, नेशते न पर्याप्ताः, किमुतान्ये । | आधुनिक पुरुषोंमें ब्रह्मविद्याके फलकी अनिश्चितताकी शङ्का की जाती है, अतः श्रुति कहती है—महाप्रभावशाली देवगण भी उपर्युक्त विधिसे उस ब्रह्मको जाननेवालेकी अभूतिका अर्थात् ब्रह्मरूप सर्वभावको न होने देनेका सामर्थ्य नहीं रखते, फिर ओरोंकी तो बात ही क्याहै ? |