भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 274
२६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| ब्रह्मविद्याफलप्राप्तौ विघ्नकरणे देवेभ्यः कथं विघ्नशङ्का <br><br> ब्रह्मविद्याफलप्राप्तौ देवादय ईशत इति का शङ्का ? इत्युच्यते—देवादान्प्रति ऋणवत्त्वान्मर्त्यानाम्। "ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः" इति हि जायमानमेवर्णवन्तं पुरुषं दर्शयति श्रुतिः। पशुनिदर्शनाच्च "अथोऽयं वा" (बृ० उ० १ । ४ । १६) इत्यादिश्लोकश्रुतेश्चात्मनो वृत्तिपरिपालयिषयाधमर्णानिव देवाः परतन्त्रान्मनुष्यान्प्रत्यमृतत्वप्राप्तिं प्रति विघ्नं कुर्युरिति न्याय्यैवैषा शङ्का। <br><br> स्वपशून्स्वशरीराणीव च रक्षन्ति देवाः। महत्तरां हि वृत्तिं कर्माधीनां दर्शयिष्यति देवादीनां बहुपशुसमतयैकैकस्य पुरुषस्य। "तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनु- | किंतु ब्रह्मविद्याके फलकी प्राप्तिमें विघ्न करनेमें देवादि समर्थ होते हैं—ऐसी शङ्का क्यों होती है ? इसपर कहते हैं—क्योंकि देवातिके प्रति मनुष्य ऋणवान् हैं, जैसा कि "ब्रह्मचर्यके द्वारा ऋषियोंसे, यज्ञद्वारा देवताओंसे और पुत्रोत्पादनद्वारा पितरोंसे [ उऋण हो ]" यह श्रुति जन्ममात्रसे ही पुरुषको ऋणी दिखाती है तथा "अथो¹ अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः" इस श्रुतिसे मनुष्यको पशुरूप बतलाया जानेके कारण जिस प्रकार उत्तमर्ण (ऋण देनेवाला) अधमर्णों (ऋण लेनेवालों) को कष्ट देता है उसी प्रकार देवगण भी अपनी वृत्तिका निर्वाह करनेके लिये परतन्त्र मनुष्योंके प्रति अमृतत्वप्राप्तिमें विघ्न करें—यह शङ्का न्याय्य ही है। <br><br> देवगण अपने इन पशुओंकी अपने शरीरोंके समान रक्षा करते हैं। एक-एक पुरुषकी अनेकों पशुओंसे समता करके श्रुति उसे देवादि-की बहुत बड़ी कर्माधीन वृत्ति दिखलायगी और यह भी कहेगी कि "अतः उन्हें यह प्रिय नहीं है |


१. यह प्रसिद्ध आत्मा समस्त भूतोंका भोग्य है ।