बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 328, कुल 1402 में से
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३२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| प्रज्ञया विज्ञानेन तपसा च कर्मणा;<br>ज्ञानकर्मणी एव हि मेधातपः-<br>शब्दवाच्ये, तयोः प्रकृतत्वात्;<br>नेतरे मेधातपसी, अप्रकरणात्;<br>पाङ्क्तं हि कर्म जायादिसाधनम्;<br>'य एवं वेद' इति चानन्तरमेव<br>ज्ञानं प्रकृतम्; तस्मान्न प्रसिद्धयो<br>मेधातपसोराशङ्का कार्या; अतो<br>यानि सप्तान्नानि ज्ञानकर्मभ्यां<br>जनितवान्पिता तानि प्रकाशयि-<br>ष्याम इति वाक्यशेषः ॥ १ ॥ | अर्थात् विज्ञानसे तथा 'तप' यानी कर्मसे; मेधा और तप शब्दोंके वाच्य ज्ञान और कर्म ही हैं, क्योंकि इन्हींका प्रकरण है, इनसे भिन्न मेधा (धारणा-शक्ति) और कृच्छ्र-चान्द्रायणादि तप इनके वाच्य नहीं हैं; क्योंकि यहाँ उनका प्रसङ्ग नहीं है; यहाँ तो स्त्री आदि जिसके साधन हैं, उस पाङ्क्तकर्मका और इसके अनन्तर ही 'य¹ एवं वेद' इस वाक्यसे ज्ञानका प्रसङ्ग है; इसलिये इन शब्दोंसे प्रसिद्ध मेधा और तप-की आशङ्का नहीं करनी चाहिये; अतः पिताने ज्ञान और कर्मके द्वारा जिन सात अन्नोंको उत्पन्न किया, उन्हें हम प्रकाशित करेंगे। इस वाक्यमें 'तानि प्रकाशयिष्यामः' (उन्हें हम प्रकाशित करेंगे) यह अंश वाक्यशेष है ॥ १ ॥² |
| तत्र मन्त्राणामर्थस्तिरोहितत्वा-<br>त्प्रायेण दुर्विज्ञेयो भवतीति तदर्थ-<br>व्याख्यानाय ब्राह्मणं प्रवर्तते— | तहाँ (मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदमें) मन्त्रोंका अर्थ गूढ़ होनेके कारण प्रायः दुर्बोध होता है, अतः उसके अर्थकी व्याख्या करनेके लिये ब्राह्मण प्रवृत्त होता है— |
१. जो इस प्रकार जानता है।
२. अर्थात् मूल मन्त्रमें इनका वाचक शब्द न होनेपर भी वाक्यको स्पष्ट तथा पूर्ण करनेके लिये वाक्यके शेष (अन्त) में इसे जोड़ लेना चाहिये। इसी प्रकार अन्यत्र भी वाक्यशेषका तात्पर्य समझना चाहिये।