भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 346
३४०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| लक्षणः क्रियाफलात्मकः संहतानेकप्राणिकर्मवासनासन्तानाविष्टब्धत्वात्क्षणिकोऽशुद्धोऽसारो नदीस्रोतःप्रदीपसन्तानकल्पः कदलीस्तम्भवदसारः फेनमायामरीच्यम्भःस्वप्नादिसमस्तदात्मगतदृष्टीनामविकीर्यमाणो नित्यः सारवानिव लक्ष्यते । <br><br> तदेतद्वैराग्यार्थमुच्यते—धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयत हेति—विरक्तानां ह्यस्माद्ब्रह्मविद्या आरब्धव्या चतुर्थप्रमुखेनेति । <br><br> यो वैतामक्षितिं वेदेति; <br> [उपासनफलम्] <br> वक्ष्यमाणान्यपि त्रीण्यन्नान्यस्मिन्नवसरे व्याख्यातान्येवेति कृत्वा तेषां याथात्म्यविज्ञानफलमुपसंह्रियते— | फलभूत यह सम्पूर्ण जड-चेतनमय संसार क्षणिक, अशुद्ध, असार, नदीके प्रवाह और दीपककी ज्योतिके समान [अस्थिर], कदलीस्तम्भके समान असार तथा फेन, मृगतृष्णा-जल और स्वप्नादिके समान असत्य होकर भी, जिनकी दृष्टि इसमें आसक्त है, उन बहिर्मुख लोगोंको ही अविकीर्यमाण (स्थिर), नित्य और सारवान्-सा दिखायी देता है; क्योंकि परस्पर मिलकर रहनेवाले नाना प्राणियोंके अनन्त कर्मों एवं उनकी वासनाओंकी परम्परासे आबद्ध हो सुस्थिर जान पड़ता है। <br><br> उससे वैराग्य करानेके लिये ही श्रुति ऐसा कहती है—'धिया धिया जनयते कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयत' इत्यादि। जो इससे विरक्त हैं, उन्हींके लिये [इस उपनिषद्के] चौथे अध्यायसे लेकर ब्रह्मविद्या आरम्भ करनी है। <br><br> 'यो वैतामक्षितिं वेद' इस मन्त्रसे, आगे कहे जानेवाले तीन अन्नोंकी भी इस समय व्याख्या कर दी गयी है—ऐसा मानकर उनके यथार्थ स्वरूपके विज्ञानके फलका उपसंहार |