भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 350

३४४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १


संस्कृतहिन्दी
स्वस्वविषयसम्बन्धे रूपशब्दादि-ज्ञानं न भवति, यस्य च भावे भवति, तदन्यदस्ति मनो नामा-न्तःकरणं सर्वकरणविषययोगि इत्यवगम्यते। तस्मात्सर्वो हि लोको मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति, तद्व्यग्रत्वे दर्शनाद्यभा-वात्।होते हुए भी उन्हें अपने-अपने विषय-का सम्बन्ध होनेपर रूप एवं शब्दा-दिका ज्ञान नहीं होता और जिसके रहते हुए वह होता है, वह उन नेत्रादिसे भिन्न समस्त इन्द्रियोंके विषयोंसे सम्बन्ध रखनेवाला मन नामका अन्तःकरण है— ऐसा ज्ञात होता है। अतः सब लोग मनसे ही देखते हैं और मनसे ही सुनते हैं; क्योंकि उसके व्यग्र होनेपर दर्शनादि क्रिया नहीं होती।
मनःस्वरूप-निर्देशः<br>अस्तित्वे सिद्धे मनसः स्वरू-पार्थमिदमुच्यते— कामः स्त्रीव्यति-कराभिलाषादिः, संकल्पः प्रत्यु-पस्थितविषयविकल्पनं शुक्ल-नीलादिभेदेन, विचिकित्सा संशय-ज्ञानम्, श्रद्धा अदृष्टार्थेषु कर्म-स्वास्तिक्यबुद्धिर्देवतादिषु च, अश्रद्धा तद्विपरीता बुद्धिः, धृति-र्धारणं देहाद्यवसादे उत्तम्भनम्, अधृतिस्तद्विपर्ययः, ह्रीर्लज्जा, धीः प्रज्ञा, भीर्भयम्, इत्येतदेव-मादिकं सर्वं मन एव; मनसो ऽन्तःकरणस्य रूपाण्येतानि।इस प्रकार मनका अस्तित्व सिद्ध हो जानेपर उसके स्वरूपके विषयमें यह कहा जाता है—काम-स्त्री-सम्बन्धकी अभिलाषादि, संकल्प-सम्मुखस्थ विषयकी शुक्ल-नीलादि भेदसे विशेष कल्पना करना, विचिकित्सा—संशयज्ञान, श्रद्धा—जिनका फल अदृष्ट है, उन कर्मों और देवतादिमें आस्तिकताका भाव रखना, अश्रद्धा—इससे विपरीत भाव रखना, धृति—धारण अर्थात् देहादिके शिथिल होनेपर उन्हें सँभाले रखना, अधृति—इसके विप-रीत होना, ह्री—लज्जा, धी—बुद्धि और भी—भय—इत्यादि प्रकारके ये सब भाव मन ही हैं; ये सब मन अर्थात् अन्तःकरणके रूप हैं।