भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 362
३५६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| करणाधारः, पूर्ववज्ज्योतीरूपमसौ चन्द्रः। तत्र यावानेव प्राणो यावत्परिमाणोऽध्यात्मदिभेदेषु, तावद्व्याप्तिमत्त्य आपः तावत्परिमाणाः, तावानसौ चन्द्रोऽस्वाधेयस्तास्वप्स्वनुप्रविष्टः करणभूतोऽध्यात्ममधिभूतं च तावद्व्याप्तिमानेव। तान्येतानि पित्रा पाङ्क्तेन कर्मणा सृष्टानि त्रीण्यन्नानि वाङ्मनःप्राणाख्यानि। अध्यात्ममधिभूतं च जगत्समस्तमेतैर्व्याप्तम्, नैतेभ्योऽन्यदतिरिक्तं किञ्चिदस्ति कार्यात्मकं करणात्मकं वा। समस्तानि त्वेतानि प्रजापतिः। | शरीर—कार्य अर्थात् करणका आधार है तथा पूर्ववत् वह चन्द्रमा ज्योतीरूप है। वहाँ जितना प्राण है अर्थात् अध्यात्मादि भेदोंमें जितने परिमाणवाला प्राण है, उतनी व्याप्तिवाला अर्थात् उतने ही परिमाणवाला जल है और उतना ही वह जलके आधेय उस जलमें अनुप्रविष्ट उसका करणभूत अध्यात्म और अधिभूत चन्द्रमा है, वह भी उतनी ही व्याप्तिवाला है। ये ही वे पिताके द्वारा पाङ्क्तकर्मसे रचे हुए वाक्, मन और प्राणसंज्ञक तीन अन्न हैं। सारा अध्यात्म और अधिभूत जगत् इनसे व्याप्त है। इनसे भिन्न कार्य और करणरूप कोई भी पदार्थ नहीं है। ये सब [ मिलकर ] ही प्रजापति हैं। | | त एते वाङ्मनःप्राणाः सर्वे एव समास्तुल्या व्याप्तिमन्तो यावत्प्राणिगोचरं साध्यात्माधिभूतं व्याप्य व्यवस्थिताः। अत एवानन्ता यावत्संसारभाविनो हि ते। न हि कार्यकारणप्रत्याख्यानेन संसारोऽवगम्यते। कार्यकारणात्मका हि त इत्युक्तम्। | वे ये वाक्, मन और प्राण सब समान अर्थात् तुल्य व्याप्तिवाले ही हैं। अध्यात्म और अधिभूतके सहित जितना भी प्राणियोंका विषय है, ये उस सबको व्याप्त करके स्थित हैं। अतः ये अनन्त हैं अर्थात् संसारकी स्थितिपर्यन्त रहनेवाले हैं; क्योंकि कार्य और करणको छोड़कर संसार अन्य कुछ नहीं जाना जाता और यह कहा ही जा चुका है कि ये कार्य-करणरूप हैं। |