बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५७
| स यः कश्चिद् हैतान्प्रजापते- <br> रात्मभूतानन्तवतःपरिच्छिन्नान- <br> ध्यात्मरूपेण वा अधिभूतरूपेण <br> वोपास्ते, स च तदुपासनानुरूपमेव <br> फलमन्तवन्तं लोकं जयति, परि- <br> च्छिन्न एव जायते नैतेषामात्म- <br> भूतो भवतीत्यर्थः । अथ पुनर्यो <br> हैताननन्तान्सर्वात्मकान्सर्वप्रा- <br> ण्यात्मभूतानपरिच्छिन्नानुपास्ते <br> सोऽनन्तमेव लोकं जयति ॥१३॥ | जो कोई प्रजापतिके स्वरूपभूत <br> इन सबको अन्तवान्—परिच्छिन्न <br> समझकर अध्यात्म या अधिभूतरूपसे <br> उपासना करता है, वह तो उस <br> उपासनाके अनुरूप फल अन्तवान् <br> लोकको ही जीतता है । अर्थात् वह <br> परिच्छिन्नरूपसे ही उत्पन्न होता है, <br> इनका आत्मभूत नहीं होता । और <br> जो इन्हें अनन्त—सर्वात्मक— <br> समस्त प्राणियोंके आत्मभूत अर्थात् <br> अपरिच्छिन्नरूपसे उपासना करता <br> है, वह अनन्त लोकपर ही विजय <br> प्राप्त करता है ॥ १३ ॥ |
तीन अन्नरूप प्रजापतिका षोडशकल संवत्सररूपसे निर्देश
| पिता पाङ्क्तेन कर्मणा सप्तान्नानि <br> सृष्ट्वा त्रीण्यन्नान्यात्मार्थमकरो- <br> दित्युक्तम् । तान्येतानि । पाङ्क्त- <br> कर्मफलभूतानि व्याख्यातानि । <br> तत्र कथं पुनः पाङ्क्तस्य कर्मणः <br> फलमेतानि ? इति उच्यते— <br> यस्मात्तेष्वपि त्रिष्वन्नेषु पाङ्क्त- <br> तावगम्यते, वित्तकर्मणोरपि तत्र <br> सम्भवात् । तत्र पृथिव्यग्नी माता, | पिताने पाङ्क्तकर्मसे सात अन्नोंको <br> उत्पन्न कर उनमेंसे तीन अपने लिये <br> निश्चित किये—यह ऊपर कहा <br> गया । पाङ्क्तकर्मके फलभूत उन <br> अन्नोंकी व्याख्या कर दी गयी । <br> किंतु वे पाङ्क्तकर्मके फल किस <br> प्रकार हैं ? सो बतलाया जाता <br> है—क्योंकि उन तीन अन्नोंमें भी <br> पाङ्क्तता देखी जाती है [ इसलिये <br> वे पाङ्क्त हैं ]; कारण, वित्त और <br> कर्मकी भी उनमें सम्भावना है । <br> उनमें पृथिवी और अग्नि माता हैं, |