बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| दिवादित्यौ पिता। योऽयमन-<br>योरन्तरा प्राणः, स प्रजेति व्या-<br>ख्यातम्। तत्र वित्तकर्मणी<br>सम्भावयितव्ये इत्यारम्भः— | द्युलोक और आदित्य पिता हैं, इन<br>दोनोंके बीचमें जो यह प्राण है, वह<br>प्रजा है—यह तो ऊपर व्याख्या<br>की जा चुकी है। अब उनमें वित्त<br>और कर्मकी सम्भावना दिखानी है,<br>इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ<br>किया जाता है— |
स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदश कला ध्रुवैवास्य षोडशी कला स रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते सोऽमावास्याँ रात्रिमेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते तस्मादेताँ रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै ॥ १४ ॥
वह यह (तीन अन्नरूप) संवत्सर प्रजापति सोलह कलाओंवाला है। उसकी रात्रियाँ ही पंद्रह कला हैं, इसकी सोलहवीं कला ध्रुवा (नित्य) ही है। वह रात्रियोंके द्वारा ही [शुक्लपक्षमें] वृद्धिको प्राप्त होता है तथा [कृष्णपक्षमें] क्षीण होता है। अमावास्याकी रात्रिमें वह इस सोलहवीं कलासे इन सब प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट हो फिर [दूसरे दिन] प्रातःकालमें उत्पन्न होता है। अतः इस रात्रिमें किसी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे, यहाँतक कि इसी देवताकी पूजाके लिये [इस रात्रिमें] गिरगिटके भी प्राण न ले ॥ १४ ॥
| 'स एष संवत्सरः'—योऽयं<br>त्र्यन्नात्मा प्रजापतिः प्रकृतः, स एष<br>संवत्सरात्मना विशेषतो निर्दिश्यते। | 'स एष संवत्सरः'—यहाँ जिस<br>अन्नत्रयरूप प्रजापतिका प्रसङ्ग है,<br>उसीका संवत्सररूपसे विशेषतः<br>निर्देश किया जाता है। वह यह |