बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 365, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 365
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५९
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
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| षोडशकलः षोडश कला अवयवा अस्य सोऽयं षोडशकलः संवत्सरः संवत्सरात्मा कालरूपः। | संवत्सर—संवत्सरात्मा अर्थात् कालरूप प्रजापति षोडशकल है; जिसकी षोडश (सोलह) कलाएँ अर्थात् अवयव हों, उसे षोडशकल कहते हैं। |
| तस्य च कालात्मनः प्रजापतेः रात्रय एवाहोरात्राणि, तिथय इत्यर्थः, पञ्चदश कलाः। ध्रुवैव नित्यैव व्यवस्थिता अस्य प्रजापतेः षोडशी षोडशानां पूरणी कला। स रात्रिभिरेव तिथिभिः कलोक्ताभिरापूर्यते चापक्षीयते च। प्रतिपदाद्याभिर्हि चन्द्रमाः प्रजापतिः शुक्लपक्ष आपूर्यते कलाभिरुपचीयमानाभिर्वर्धते यावत्सम्पूर्णमण्डलः पौर्णमास्याम्। ताभिरेवापचीयमानाभिः कलाभिरपक्षीयते कृष्णपक्षे यावद् ध्रुवैका कला व्यवस्थिता | उस कालस्वरूप प्रजापतिकी रात्रियाँ—अहोरात्र अर्थात् तिथियाँ ही पंद्रह कलाएँ हैं तथा इस प्रजापतिकी सोलहवीं अर्थात् सोलह संख्याकी पूर्ति करनेवाली कला ध्रुवा—नित्य व्यवस्थिता ही है। वह रात्रियों अर्थात् कलारूपसे कही हुई तिथियोंसे ही पूर्ण और अपक्षीण होता है। वह चन्द्रमा प्रजापति शुक्लपक्षमें प्रतिपद् आदि तिथियोंसे बढ़ता है, वह बढ़ती हुई कलाओंसे तबतक बढ़ता रहता है, जबतक कि पूर्णमासीको पूर्णमण्डलाकार न हो जाय; तथा क्षीण होती हुई उन्हीं कलाओंके द्वारा कृष्णपक्षमें तबतक क्रमशः क्षीण होता जाता है, जबतक कि अमावास्यामें एक ध्रुवा कला ही शेष न रह जाय। |
| अमावास्यायाम्।<br>स प्रजापतिः कालात्मा अमावास्याममावास्यायां रात्रिं रात्रौ या व्यवस्थिता ध्रुवा कलोक्ता एतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राण- | वह कालस्वरूप प्रजापति, 'अमावास्यां रात्रिम्'—अमावास्यामें रातके समय जो एक ऊपर बतलायी हुई ध्रुवा नामकी कला रहती है, उस सोलहवीं कलाके द्वारा इन समस्त प्राणधारियों |