भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 366
३६०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| भूतप्राणिजातमनुप्रविश्य यदपः पिबति यच्चौषधीरश्नाति तत्सर्वमेव ओषध्यात्मना सर्वं व्याप्यामावास्यां रात्रिमवस्थाय ततोऽपरेद्युः प्रातर्जायते द्वितीयया कलया संयुक्तः ।<br><br>एवं पाङ्क्तात्मकोऽसौ प्रजापतिः । दिवादित्यौ मनः पिता; पृथिव्यग्नी वाग्जाया माता; तयोश्च प्राणः प्रजा । चान्द्रमस्यस्तिथयः कला वित्तम्, उपचयापचयधर्मित्वा-द्वित्तवत् । तासां च कलानां काला-वयवानां जगत्परिणामहेतुत्वं कर्म । एवमेष कृत्स्नः प्रजापतिः “जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीय” (बृ० उ० १ । ४ । १७) इत्येषणानुरूप एव पाङ्क्तस्य कर्मणः फलभूतः संवृत्तः । कारणानुविधायि हि कार्यमिति लोकेऽपि स्थितिः ।<br><br>यस्मादेष चन्द्र एतां रात्रिं सर्वप्राणिजातमनुप्रविष्टो ध्रुवया कलया वर्तते, तस्माद्धेतोरेताम- | अर्थात् प्राणिसमुदायमें अनुप्रवेश कर जो जल पीता है और जो ओषधि खाता है, उन सभीमें ओषधिरूपसे व्याप्त हो अमावास्याकी रात्रिमें स्थित रह दूसरे दिन प्रातःकाल द्वितीय कलासे संयुक्त होकर उत्पन्न होता है ।<br><br>इस प्रकार यह प्रजापति पाङ्क्त-रूप है । द्युलोक, आदित्य और मन पिता हैं; पृथिवी, अग्नि और वाक् जाया—माता हैं; उन दोनों माता-पिताओंकी प्रजा प्राण है । चन्द्रमा-की तिथियाँ यानी कलाएँ वित्त हैं, क्योंकि वे वित्तके समान वृद्धि और ह्रासरूप धर्मवाली हैं । तथा उन कालावयवरूप कलाओंका जगत्के परिणाममें हेतु होना कर्म है । इस प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजापति “मेरे जाया हो, फिर मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ; मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूँ” इस प्रकारकी एषणाके अनुरूप ही पाङ्क्तकर्मका फलभूत हो जाता है । लोकमें भी ऐसी ही स्थिति है कि कार्य कारणका अनुवर्ती होता है ।<br><br>क्योंकि इस रात्रिमें यह चन्द्रमा अपनी ध्रुवा कलाके सहित समस्त प्राणिसमुदायमें अनुप्रविष्ट होकर विद्यमान रहता है, इसलिये इस |

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