भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 429

| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४२३ | | :--- | :--- |


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तं गार्ग्यं सलज्जमालक्ष्य विश्रम्भजननाय पाणौ हस्त आदाय गृहीत्वोत्तस्थावुत्थितवान्। तौ ह गार्ग्याजातशत्रू पुरुषं सुप्तं राजगृहप्रदेशे क्वचिदाजग्मतुरागत्तौ। तं च पुरुषं सुप्तं प्राप्य एतैर्नामभिः ‘बृहन् पाण्डरवासः सोम राजन्’ इत्येतैरामन्त्रयाञ्चक्रे। एवमामन्त्र्यमाणोऽपि स सुप्तो नोत्तस्थौ, तमप्रतिबुध्यमानं पाणिना आपेषमापिष्यापिष्य बोधयाञ्चकार प्रतिबोधितवान्; तेन स होत्तस्थौ। तस्माद्यो गार्ग्येणाभिप्रेतः, नासावस्मिञ्छरीरे कर्त्ता भोक्ता ब्रह्मेति।फिर उस गार्ग्यको लज्जायुक्त देख उसे विश्वास उत्पन्न करनेके लिये वह उसका हाथ पकड़कर खड़ा हुआ। और वे गार्ग्य तथा अजातशत्रु राजभवनके भीतर कहीं सोये हुए पुरुषके पास आये। उस सोये हुए पुरुषके पास पहुँचकर अजातशत्रुने उसे ‘हे बृहन् ! हे पाण्डरवास ! हे सोम राजन् !’ इन नामोंसे पुकारा। इस प्रकार पुकारनेपर भी वह सोया हुआ पुरुष न उठा, तब उस न जागनेवाले पुरुषको हाथसे दबा-दबाकर जगाने लगा, इससे वह उठ बैठा। अतः जिसे गार्ग्य ब्रह्मरूपसे मानता था, वह इस शरीरमें कर्ता-भोक्ता ब्रह्म नहीं है।
कथं पुनरिदमवगम्यते सुप्तपुरुषगमनतत्सम्ब्बोधनानुत्थानैर्गार्ग्याभिमत्तस्य ब्रह्मणोऽब्रह्मत्वं ज्ञापितमिति ?<br>(पार्श्वटिप्पणी: सुप्तपुरुषाभिसरणहेतुः परामृश्यते)**शङ्का—**किंतु यह कैसे जाना जाता है कि सुषुप्त पुरुषके पास जाने, उसे पुकारने और उसके न उठनेसे गार्ग्यके अभिमत ब्रह्मका अब्रह्मत्व सूचित किया गया है ?
जागरितकाले यो गार्ग्याभिप्रेतः पुरुषः कर्त्ता भोक्ता ब्रह्म संनिहितः करणेषु यथा, तथाजातशत्र्वभिप्रेतोऽपि तत्स्वामी भृत्ये-**समाधान—**गार्ग्यका अभिप्रेत जो पुरुष है, वह जिस प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें कर्त्ता—भोक्ता ब्रह्म है और वह इन्द्रियोंमें सन्निहित है, उसी प्रकार अजातशत्रुका अभिप्रेत उसका स्वामी भी भृत्योंमें राजाके समान उनमें